मौनी स्वामी की जीवनी
मौनी स्वामी की जीवनी मौनी स्वामी, जिन्हें महाराष्ट्र के सोलापुर के एक अत्यंत पवित्र देशस्थ ब्राह्मण परिवार में जन्म लिया था, बचपन से ही उनका आध्यात्मिक झुकाव था। बचपन में ही वे घर छोड़कर तीर्थयात्रा पर निकल पड़े और काशी, रामेश्वर जैसे पवित्र स्थानों की यात्रा पैदल ही की। वर्षों तक उन्होंने कडुलिंब के पत्तों का रस ही अपना आहार बनाया। श्री दत्त प्रभू की आज्ञा से, 25 वर्ष की आयु में उन्होंने संन्यास ग्रहण किया और उन्हें प्रद्युम्न नंद का नाम दिया गया। हालांकि, 12 वर्षों तक कठोर मौन व्रत के पालन के बाद उन्हें लोग मौनी स्वामी या मौनी बाबा के नाम से जानने लगे। उज्जैन में कुछ समय निवास करते हुए, उन्होंने श्री गोपाल कृष्ण का एक सुंदर मंदिर निर्मित करवाया। उनका हृदय कृष्ण भक्ति और दत्त भक्ति में हमेशा रमा रहता था। उज्जैन से वे सीधे नारसोबा वाडी पहुंचे और वहां पर निवास किया। मौनी स्वामी के जीवनकाल की सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन उनके शिष्य, प. पू. वक्रतुंड शास्त्री, जिनका जन्म 1839 में हुआ था, उन्हें गुरु के रूप में मानते थे। इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि मौनी स्वामी का काल लगभग 18...