श्री 108 श्री स्वामी रामदासजी काठिया बाबा का जीवन चरित्र | Part 04
श्रीरामदासजी की सभी आवश्यकीय वस्तुएँ बिना मांगे ला लाकर लोग पंहुचा देते थे। दो-तीन रूपए के गांजे और चरस की भेंट नित्य आ जाती थी। और इसी भांति खाने की सभी सामग्रियां भी आ जाती थी। इस वैभव को देखकर चोरों ने विचारा कि उन्होंने बहुत रूपए बटोर कर रख लिए होंगे, इसलिए रात्रि में आकर वे कभी कभी उत्पात मचाने लगे। रात्रि के चोर दिन में सज्जन बनकर फिरते थे। चोरों में कोई ब्राम्हण, कोई क्षत्रिय तथा कोई अन्य जाती के थे। उन में से कोई- कोई दिन में उनके पास आ बैठते और तमाखू, गाँजा पीते तथा गप - शप करते थे। एक दिन सवेरे ऐसे ही तीन भद्रवंशोद्भव वृन्दावनवासी चोरों ने उनके पास बैठकर बातें करते-करते किसी बात से उत्तेजित होकर उनसे कहा -"बाबाजी! सिंह की भाँति निर्भय होकर बातें करते हो, इसका फल एक दिन रात को भली- भांति पाओगे।" तब श्रीरामदासजी ने कहा -"मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि तुम लोग चोट्टे-बदमाश हो, पर अब तुम इतने बढ़ चढ़ रहे हो कि साधु को भी धमकाने लग गए हो। अच्छा मैं कह देता हूँ कि तुम आज ही पुलिस से पकड़ लिए जाओगे।" चोरों ने कहा -"अरे, रहने दे बाबाजी तेरी सिद्धाई...