श्री 108 श्री स्वामी रामदासजी काठिया बाबा का जीवन चरित्र | Part 01
जीवन चरित्र
श्री स्वामी रामदासजी कठिया बाबा का जन्म 1700 में आषाढ़ी पूर्णिमा के दिन , अमृतसर से लगभग बीस कोस दूर लोनाचमारी नामक गांव में एक ब्रम्हाण वंश में हुआ था । उनके माता - पिता ने उनका नाम जयराम रखा था। उनके माता - पिता उस गांव के सम्मानित लोगों में गिने जाते थे । जयराम अपने माता - पिता के तीसरे पुत्र थे ।
उनके पिता के घर के निकट ही एक संत रहा करते थे | जयराम बचपन में उनके पास जा कर बैठते थे | संत महाराज उनपर बहुत स्नेह रखते थे | गाँव के छोटे बड़े सभी प्रकार के लोग प्रतिदिन उनके दर्शन के लिए आते थे और उनको शाष्टांग दण्डवत किया करते थे | बालक जयराम देखते और अपने मन में विचारते कि इस संसार में ये महात्मा ही सबसे बड़े है | यह देख जयराम की उनके प्रति अपार श्रद्धा हो गई |
एक दिन चार वर्ष की अवस्था में वे जब उन संत के पास अकेले बैठे थे उस समय वे महात्मा जी बड़े स्नेह के साथ उनसे इधर उधर की बाते कर रहे थे कि इतने में उन्होंने उनसे कहा , "महाराज आप इस संसार में सबसे बड़े है , सभी लोग आ-आ कर आपके चरणों में माथा टेकते है , आपसे मैं पूछना चाहता हूँ कि आप इतने बड़े कैसे हो गए ?" महात्माजी हँस कर बोले - "बाबा,मैं सदा राम नाम जपता रहता हूँ , राम के नाम ने मुझे बड़ा बनाया है | तुम भी राम नाम जप लिया करो, एक दिन तुम भी बड़े हो जाओगे |" जयराम बोले - "राम नाम लेने से यदि इतने बड़े हो जा सकते है तो मैं भी राम नाम जपूँगा |" वे उस समय से अपने जी में सदा राम नाम जपने लगे और जब वे उन महात्मा जी के पास जाते , तब वे भी राम नाम जपने में उन्हें उत्साहित किया करते थे |
जयराम जब सात वर्ष के हुए , तब एक दिन मध्यान्ह के समय घर के सभी भैसों को चरा रहे थे कि इतने में एक साधुजी उनके पास पधारे | साधुजी के शरीर की छटा देख कर वे मुग्ध हो गए | साधुजी मुस्कुराते-मुस्कुराते उनके पास आकर उनसे बोले - बच्चा हमको कुछ खिलाएगा ? " जयराम ने कहा - "जी हां मैं आपको खिलाऊंगा ; आप यहाँ रहकर मेरी भैसों को देखते रहिये , मैं घर जा कर आपके लिए कुछ ले कर आता हूँ |" साधुजी बोले - " मैं तेरी भैसों को देखता हूँ , तू मेरे लिए कुछ खाने को ला |" जयराम घर जा कर चुपचाप भंडार में घुस कर अपमी इच्छानुसार बहुत घी,चीनी और आटा उठा कर साधुजी के पास ले आए | साधुजी उन सामग्रियों को देखकर बहुत प्रसन्न हुए और उसे लेकर वरदान दिया - "बच्चा तू योगिराज होगा |" जयराम ने कहा - " मेरे तो माता पिता है , घर द्वार है भैसे है , मैं नित्य पांच सेर दूध पिता हूँ , मैं योगिराज कैसे हो जाऊँगा ?" साधुजी बोले - "बच्चा मेरे वचन से तू योगिराज अवश्य होगा|" इतना कहकर वे अंतर्ध्यान हो गए ; तत्काल ही जयराम के ह्रदय में यह अनुभव होने लगा कि उनका संसार छूट गया , माता पिता , घर तथा भैंस आदि का मोह छूट गया | उन्होंने जाना की गृहस्थाश्रम उनके लिए नहीं है ,पर अपने हृदय का यह भेद उन्होंने किसी से नहीं खोला |
तब से कुछ दिनों के पश्चात जयराम का उपनयन संस्कार (इस संस्कार में वटुक को गायत्री मंत्र की दीक्षा दी जाती है और यज्ञोपवीत धारण कराया जाता है।) कराकर पिताजी ने उन्हें शास्त्र पढ़ने के लिए दूसरे गांव में एक नामी विद्वान गुरूजी के यहाँ भेजा | वे उनके पास शास्त्र पढ़ने लगे | एक दो बार पढ़कर ही उनका नियमित पाठ अभ्यस्त हो जाता था | तत्पश्चात लड़कों के साथ पढ़ने या खेलने में न लगकर वे एक ओर बैठ कर महात्माजी के उपदेश के अनुसार राम नाम का जप करते थे | इस प्रकार गुरूजी के यहाँ रहते सात-आठ वर्ष बीत गए | उन्होंने सारस्वत व्याकरण , हरचक्र आदि ज्योतिष , कुछ धर्मशास्त्र , विष्णुसहस्त्रनाम आदि शास्त्र पढ़ लिए | तदनन्तर गुरुजी माहाराज ने उन्हें गीता पढ़ाना प्रारम्भ किया | गीता का पाठ आरंभ करते ही वे समझने लगे की मानो वे प्राण को प्राप्त हो गए है गीता उन्हें प्राणो से प्यारी हो गई | गीता अध्ययन समाप्त होने पर उनके गुरूजी महाराज ने गुरुकुल में पाठ समाप्त हो गया है समझ कर घर लौटने की आज्ञा दी | उन्होंने गुरूजी का अभिवादन कर अपने पठित ग्रंथो को एक गठरी में बांध कर अपने पीठ पर ले लिया पर श्रीमद्भागवद्गीता उन्हें बहोत प्यारी थी इसलिए उस ग्रन्थ को अपने वक्ष:स्थल पर रख कर कपडे से बांध लिया और अपने गुरूजी के आश्रम से रवाना हो कर अपने घर की ओर चल दिए |
घर पर लौटने के पश्चात उनके पिताजी उनके विवाह का प्रबंध करने लगे | उन्होंने विनती की कि "मैं विवाह नहीं करूँगा, अपने दूसरे पुत्रों का , जो अविवाहित है , आप उनका विवाह करा दे |" पिताजी ने उनकी विनती को मान उनके छोटे भाइयों का विवाह करा दिया |
जयराम ने पहले गायत्री मंत्र को सिद्ध करना चाहा | ग्राम के एक प्रान्त में पिताजी के घर के समीप ही एक बड़ा सा वट वृक्ष था | उन्होंने गायत्री मंत्र के शाप , शापोद्वार और कवच आदि को यथाविधि सिख , उस वृक्ष के निचे बैठ , विधि पूर्वक गायत्री मंत्र जपना आरम्भ किया | सवा लाख मंत्र जपने से यह सिद्ध हो जाता है ऐसा ज्ञात रहने से वे इतने ही जपों को पूरा करना ठानकर एकाग्र मन से जप करते रहे | जब एक लाख जप पुरे हो गए , तब अचानक आकाशवाणी हुई कि - "वत्स बाकी 24 हजार जपों को ज्वालामुखी में जा कर पूरा करने से मैं सिद्ध हो जाउंगी |" इस आकाशवाणी को सुन अत्यंत उत्साहित हो , उन्होंने तुरंत ही ज्वालामुखी के लिए प्रस्थान किया | उनके साथ उनका समवयस्क भतीजा भी साथ चल दिया | ज्वालामुखी उनके पिता के घर से लगभग तीस चालीस कोस की दुरी पर था | मार्ग में जाते हुए एक स्थान पर उन्होंने देखा कि एक अतिशय वृहत जटाधारी साधु बैठे है | उनको देखते ही उनके प्रति वे अत्यंत आकृष्ट होकर उनके पास उपस्थित हुए और साष्टांग प्रणाम कर बोले -"महाराज मैंने ब्राम्हण कुल में जन्म ग्रहण किया है, मैं आपके चरणों में शरण लेता हूँ , आप मुझे अपना चेला बनाइये |" साधुजी प्रसन्न हुए और मुस्कुरा कर बोले -"तुझे चेला बनाऊंगा , तू यहाँ रह जा |" उसी दिन मुंडित होकर उन्होंने उनसे वैराग्य आश्रम में प्रवेश करके नैष्ठिक ब्रम्हचर्य व्रत ग्रहण किया | उसी समय गुरूजी की कृपा से उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि उनके समस्त अभीष्ट पुरे हो गए , उनकी सब प्रकार की अशांति दूर हो गई और वे आनंद में मग्न हो गए | गुरूजी ने जयराम के वैराग्य आश्रम का नाम 'रामदास' रखा | जयराम का भतीजा जो उनके साथ आया था , आश्चर्यचकित होकर चुप रह गया और उसने घर लौटकर उनके माता पिता को वह सन्देश दे दिया | सुनकर उनकी माताजी रोते-रोते विकल हो पड़ी | यह देखकर उनके पिताजी उनके भतीजे को संग लेकर गुरूजी के पास पधारे और गुरूजी के चरणों में गिरकर रोते-रोते बोले -"आप एक बार मेरे इस बच्चे को छोड़ दीजिए , इसकी माता इसके विछोह से विकल हो पड़ी है , उससे एकबार भेंट कर वह फिर आपकी सेवा में चला आएगा |" गुरूजी दयाद्र होकर रामदास से बोले -"अच्छा बच्चा,साधु को एकबार जन्मस्थान का भी दर्शन करना चाहिए , सभी ठौर एक सा होता है , इसमें कुछ दोष नहीं , तुम इनके संग जाओ और अपने जन्म स्थान का अनुभव करो | " वे गुरूजी की आज्ञा पा उन्हें शाष्टांग दण्डवत प्रणाम कर पिताजी के साथ जन्म-स्थान को लौटे |
पिताजी के साथ जन्मस्थान में लौटकर जिस वट वृक्ष के निचे गायत्री मंत्र का जाप किया था , वहीं पर अपना आसन लगाया और एक-एक दिन एक-एक घर में वे बारी-बारी से दोपहर को भिक्षण लेने लगे | पहले दिन ही रात्रि में उस वृक्ष के निचे वे जब अपने आसन पर मन को एकाग्र कर बैठे थे , तब अचानक आकाश मंडल भेद कर गायत्री देवी आविर्भूत हुई ,देवी ने कहा " बेटा तुम्हारी निष्ठा से प्रसन्न होकर मैं तुम्हारे लिए सिद्ध हुई हूँ , मेरे मंत्र का और जप अब तुमको न करना पड़ेगा ; तुम मुझसे वरदान मांगो |" वे यथोचित रीती से उनको प्रणाम कर बोले - " मातेश्वरी अब तो मैं साधु हो गया हूँ , संसार छोड़ चूका हूँ , मेरी कोई भी वासना नहीं रही , आप मेरे ऊपर प्रसन्न रहिए , इसको छोड़ और किसी वरदान की अब मुझे आवश्यकता नहीं है |" देवी एवमस्तु (ऐसा ही होगा ) कहकर अदृश्य हो गई |
तत्पश्चात पूर्वोक्त नियमानुसार वे दोपहर के समय एक-एक दिन एक-एक घर में भोजन कर निर्वाह करने लगे | पर जिस दिन वे अपनी माता के घर पहुंचे , उस दिन उनके आगे भिक्षण रख कर उनकी माता फुट फुट कर रोने लगी ; तब वे बोले " माँ इस प्रकार रोने से मैं कैसे खाऊंगा?" इससे उनकी माता कुछ शांत हो गई और उन्होंने भिक्षण तो खा लिया पर माताजी का रोना बंद नहीं हुआ | भोजन कर चुकने पर वे बोले , "तुम यूँ रोओगी तो मैं कैसे यहाँ आऊंगा ? मैंने जो पथ लिया है उससे तो मेरा और तुम्हारा दोनों का कल्याण होगा |" यह सुन माताजी ने कहा -" अच्छा बेटा तुम्हारा भला हो , मैं अब न रोउंगी , और बारी-बारी से आने की जैसे बात हुई है उसे मान तुम मेरे यहाँ भिक्षान्न लेने आना |"
वे उसी वट के निचे अपने आसन पर बैठ कर भजन- मनन करने लगे और दोपहर के समय बारी-बारी से एक दिन एक के घर जाकर भिक्षान्न लेने लगे | इसी प्रकार वहां कई दिन कट गए | एक दिन संध्या के बाद उनके पूर्व आश्रम के सम्बन्ध की एक रूपवती युवती भ्रातृवधू उनके आसन के पास आ बैठी और बहुत देर तक नाना प्रकार के वार्तालाप कर लौट गई | उसके बाद हर रोज वह संध्या के बाद उनके पास अकेली आती और उनके पास में बैठ कर आमोद प्रमोद और हास्य सम्बन्धी बातें किया करती थी | उसके दो तीन दिन इसी प्रकार आने से वे उसके मनोगत अभिप्राय ( मन की इच्छा ) को समझ गए | वे उससे बोले -"मैं एक साधु हूँ , तुम जैसी युवती को इस निर्जन (सुनसान ) स्थान में मेरे पास नहीं आना चाहिए | अगर तुम धर्म सम्बन्धी बाते सुनना चाहती हो तो यहाँ दिन में आ सकती हो , संध्या के पश्चात् तुम और कभी मेरे पास मत आना | उनकी इस बात पर वह हँसकर बोली -" इसमें दोष ही क्या है ?" उन्होंने कहा -" नहीं, तुम अब यहाँ कभी मत आना , इसमें दोष है, साधुओं के नियम के विरुद्ध है |" पर दूसरे दिन रात को फिर भी उन्होंने उस औरत को अपने आसन के करीब आते हुए देखा तो क्रुद्ध होकर एक ढेला (पत्थर का छोटा सा टुकड़ा ) उठा कर उसपर फेंका , जिससे खिन्न होकर वह वहां से चली गई | तब उन्होंने अपने मन में यह विचार किया की मैं यहाँ बहुत दिन से रह रहा हूँ , अब यहाँ पर रहना उचित नहीं है , इसलिए मुझे इस स्थान को छोड़ कर चले जाना चाहिए | यह विचारकर उन्होंने सबसे विदा लिया और अपने जन्मस्थान को छोड़ कर चल दिए |
इस प्रकार और भी एक बार वे एक स्त्री के प्रलोभन में पड़ गए थे | एक बार एक अतिरूपयौवनसम्पन्ना (सुन्दर और युवा) रानी से संयोगवश उनकी भेट हो गई , वह बड़ी ही भक्ति से उनकी सेवा करने लगी | उसकी सेवा और भक्ति से वे उसकी ओर आकृष्ट होने लगे | तत्पश्चात एक दिन वह रानी एकांत में उनके पास आकर सम्पूर्ण रूप से स्वयं को उन्हें समर्पित करते हुए बोली "मैं एक पतिहीना बालविधवा हूँ , आपकी ओर मेरा मन बहुत आकृष्ट हुआ है , इसलिए आप अब से मेरे ही साथ सदा रहिए, और मेरे समस्त राज्य का उपभोग कीजिए |" उनका मन उसकी ओर पहले से ही आकृष्ट था इसलिए यह बात सुनकर पहले कुछ देर के लिए तो वे प्रसन्न हुए परन्तु तत्काल ही उन्हें अपने वैरागाश्रम का स्मरण हो गया, जिससे अपने मन को धिक्कार कर उन्होंने रानी से कहा -" मैं साधु हूँ , मैं कैसे अपने आश्रम की अवज्ञा कर आपके साथ भोग विलास कर सकता हूँ | इसलिए आप मेरे प्रति मोह को छोड़ दीजिए , मैं अभी यहाँ से चला जाता हूँ |" इतना कहकर वे तुरंत ही उस स्थान को छोड़ कर चल दिए | इस घटना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा था कि - " उस रानी की ओर मेरा मन अलक्षित (अस्पष्ट ) रूप से आकृष्ट हो चूका था ; राह में चलते हुए उसके हाव भाव के स्मरण से मेरा मन कभी -कभी उद्विग्न (विचलित ) हो जाता था | कुछ -कुछ दूर चलकर मैं विवश हो बैठने लगा , और मेरे जी में यही विचार उठने लगा कि उसके पास लौट कर जाऊं या नहीं | अंत में भगवत्कृपा से मेरा मोह दूर हो गया , मैं फिर आत्मस्थ ( स्थिर विचार ) हो कर उस देश को छोड़ कर चल दिया | "उन्होंने आगे कहा -" स्त्री की आकर्षण शक्ति से पार पाना पुरुष के लिए विशेषतः युवक के लिए बड़ा ही कठिन है , मैं उस फेर में पड़कर भली भांति जान गया कि बिना भगवत्कृपा के जीव उस मोह से नहीं बच सकता |"
इसी प्रकार एक और घटना का वर्णन श्री रामदास जी ने किया है :-
" अपने बालवैराग्य की अवस्था में मैं एक बार और भी एक आफत में पड़ गया था , जिससे भी मैं श्रीभगवत्कृपा से बच गया था | भारत के उत्तराखंड में गंगोत्री के पास एक पहाड़ पर भ्रमण करते हुए मैंने सामने एक वृहत उच्च प्रस्तरमय ( पत्थर ) पहाड़ देखा जिसके निचे भूमि से संलग्न एक स्थान पर मुझे जान पड़ा की एक पत्थर का टुकड़ा अलगाया हुआ सा है | कौतूहलवश मैं उस पत्थर के टुकड़े को ठेल -ठेल कर हटाने लगा तो वह सरका | मैंने देखा की वहां पर एक गुफा का द्वार है , फिर भी कौतूहलवश मैं गुफा के अंदर घुसा | गुफा में मैंने देखा कि अतीवृहत्काय बहुत प्राचीन सुपक्वजटाधरी एक पुरुष योगासन में बैठे हुए हैं ; उनकी भृकुटि के चमड़े निचे की ओर इतने बढ़ गए है कि उनसे उनकी आँखे सम्यक आवृत है | उनको देखकर ही मैं लौटा और धीरे-धीरे गुफा के बाहर चला आया | उन्होंने भी मेरे पीछे पीछे बाहर आकर अपनी आँखों पर लटकते हुए चमड़े को दोनों हाथों से धीरे धीरे ऊपर उठाया तो मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि मानो उनके विशाल नेत्रों से अग्निवृष्टि हो रही है | मैं भयभीत हो सोचने लगा कि ये मुझे अभी भस्म कर डालेंगे क्योंकि तपस्या में मैंने विघ्न डाला है | उन वृहत्काय पुरुष ने मुझसे पूछा -" तू कौन है ? " डर से हिचक कर मैंने उत्तर दिया -" महाराज मैं आपका चेला हूँ ।'' उन्होंने कहा - चेला कैसा ? मैं जो कुछ कहूंगा वह तू कर सकेगा ? '' मैंने कहा , '' आपकी कृपा से करूँगा ।'' जहाँ हम दोनों में वह बातचीत हो रही थी वह स्थान उस पहाड़ का ही एक भाग था उसके निकट ही एक बहोत बड़ी घाटी थी जो कम से कम 50 हाथ गहरी थी । उस घाटी के निम्नभाग में नक्षत्रवेग से पर्वतीय निर्झर के समान गंगा प्रवाहित हो रही थी । मेरे उत्तर को सुनकर उन वृहत्काय प्राचीन पुरुष ने प्रवाहित गंगा नदी की ओर संकेत करते हुए कहा - " तू चेला है तो उसमे कूद पड़ । इस आज्ञा को सुन कर मेरे जी में यह विचार आया कि यदि मैं गंगाजी में न कुदूं तो ये मुझे भस्म कर डालेंगे और यदि मैं कुदुं तो भी कदाचित मुझे मरना ही पड़ेगा । तथापि इन दोनों में यही अच्छा है कि मैं इनकी आज्ञा को ही मानूं , यह सोचकर मैं वहां से निचे कूदकर गंगाजी के जल में प्रविष्ट हुआ , पर वेग की तीव्रता के कारण शीघ्र ही जल के ऊपर आ गया । संकीर्ण गंगाजी के उभय पार्श्व में वृहत उच्च पर्वत होने के कारण घाटी में प्रकाश का प्रवेश बहुत कम होता था ; उस अंधकारमय स्थान में वेग की तीव्रता के कारण विवश होकर मैं प्रवाहित होने लगा ।तब उन पुरुष-प्रवर ने पहाड़ के ऊपर रहकर ही अपने योगबल से हाथ को प्रसारित कर मेरे केश पकड़ मुझे जल से उठा यकायक अपने सामने लाकर उपस्थित किया । मैं इस अलौकिक अद्भुतकर्म से चकित हो उनके चरणों में गिरा । मुझे स्नेह के साथ उठाकर वे बोले -" बेटा तू चेला होने के योग्य है , तेरा कल्याण हो । तू अभी यहाँ से और कहीं चला जा " यह ऋषियों के तपस्या का स्थान है , यहाँ तू मत रह । " तब उनको दण्डवत करके मैं वहां से चला | उत्तराखंड के पहाड़ों पर अनेक स्थलों में छिपकर ऐसे ऐसे प्राचीन ऋषि रहते है , जिनकी किसी प्रकार की अवज्ञा करने से बहुधा विपत्ति झेलनी पड़ती है ।"अनन्तर कुछ दिनों में श्री रामदास जी अपने गुरुदेव की सेवा में फिर आ पहुंचे ।
श्री रामदास जी के गुरु अति दीर्घकार्य वृहत -जटामण्डित थे और श्रीनिम्बार्क -सम्प्रदाय के अंतर्गत श्रीमान नागाजी धारा के आचार्य थे। उनका नाम था परम पूजनीय श्री 108 स्वामी देवदास जी महाराज। अयोध्या प्रान्त के निकट किसी स्थान में उन्होंने जन्म लिया था । वे योगेश्वर सिद्ध पुरुष थे ; उनके दर्शन करते ही अपने आप सबके सर झुक जाते थे । वे छह मास तक अपने आसन पर समाधी लगाकर विराजते थे । जब वे समाधिस्थ न रहते तब भी नहीं सोते थे । उस समय वे गांजे और चरस का धुँआ कभी -कभी पीते थे और दिन में एक बार धुनि से कुछ विभूति श्री रामदास जी से कपडे के द्वारा छनवाकर एक काठ के कमंडल के जल में डलवाते और उसे पी जाते थे कुछ देर में डकार लेकर घुली हुई उस विभूति को बर्तन में वमन कर देते थे | वे विभूति -मिश्रित जल को तुलवाकर पीते थे और वमन के पश्चात उनसे कहते -" इसे तौल कर देखो कि मैं जितनी घूंट पी गया था ठीक उतनी ही निकली है या नहीं ।" तौल में ठीक उतना ही जल निकलता था जितना वो पीते थे । केवल यही उनका आहार था । श्री रामदास जी उन्हें साक्षात् ईश्वर समझते थे ।
उनके आहार के विषय में श्री रामदास जी कहते है "मैंने एक दिन इस नियम का व्यक्तिक्रम भी देखा | एक दिन वे मुझसे बोले -"बाबा हमारा पेट गर्मी से भर गया है , तुम हमको कुछ दूध पिलाओ तो गर्मी मिट जाए | मैं तत्काल ही बस्ती में जाकर एक बड़े हंडे में भरकर आधा मन दूध लाया और उनके सामने में रखकर हाथ जोड़कर बोला - " महाराज मैं दूध लाया हूँ आपको जीतनी इच्छा हो पी लीजिए | तब उन्होंने प्रसन्न होकर हंडे को दोनों हाथों से उठा लिया और देखते ही देखते सारा दूध पी गए | आधा दूध को बिना रुके पी जाते देखकर मैं आश्चर्यचकित रह गया पर सारे दूध को पीकर उन्होंने कहा -" बेटा हमारे पेट की गर्मी कुछ तो मिटी है , बाकी और भी बहुत रह गई है ; हमको कुछ और दूध पिलाओ |" इस बात पर आश्चर्य करते हुए मैंने हाथ जोड़कर निवेदन किया -"आप परमात्मा है ; आपके कोठे की गर्मी को दूसरा कौन मिटा सकता है ? मुझ में सामर्थ्य ही कितनी है कि मैं उसे मिटाऊं ? आप एक ही घुट में आधा मन दूध पी गए , इस पर भी जब आपके पेट की गर्मी नहीं मिटी तो मैं और क्या कर सकता हूँ ?'' मेरी बात सुनकर वे हँसते हुए बोले -" नहीं नहीं बच्चा , कुछ और दूध लाओ , तुम अब जो लाओगे उसी से मेरे कोठे की गर्मी मिट जाएगी | फिर मैं बस्ती में जाकर पांच सात सेर दूध लाया | वह भी वे पी कर बोले - " अब तो हमारे कोठे की गर्मी मिट गई , हम प्रसन्न हुए |" किन्तु इस दूध को उन्होंने वमन करके नहीं निकाला
अपने गुरु की महिमा का गुणगान करते हुए वे आगे कहते है कि , ''गुरूजी की महिमा मैंने अनेकबार प्रत्यक्ष की | इस विषय में मैं यहाँ दो घटनाओं का वर्णन करता हूँ | ''एक बार लगभग एक हजार साधुओं को साथ लेकर गुरुमहाराज ने लाहौर के निकट आसन स्थापित किया | शहर के बहुत बनिए, सेठ, साहूकार उनके और उनके जमात के साधुओं के दर्शन के लिए आए | उनमे एक अति धनाढ्य दुशाले का व्यापारी बनिया था | गुरु महाराज ने उससे कहा " आज तुम इन साधुओं को खिलाओ | वह बोला -" इतने साधुओं को मैं नहीं खिला सकूंगा | इसके अतिरिक्त उसने साधुओं के प्रति कुछ अपशब्द भी बोले | गुरु महाराज बोले -" बनिया तू धनमद से मत्त हुआ है , साधुओं की भी अवज्ञा करता है | इसलिए तुझे कुछ दंड मिलाना चाहिए | जा तू अपने घर को लौट जा , तेरे दुशाले के गट्ठर पर आज ही अग्निदेव का कोप होगा | बनिए के चले जाने पर गुरु महाराज ने कुछ जल हाथ में ले कर उसे अपनी धुनि की आग में छोड़ा और कहा " बनिए के दुशाले के गट्ठर में यह आग लगी |" मैं उस समय उनके समीप ही बैठा था |
थोड़ी ही देर में मैंने देखा कि बनिया उर्द्ध श्वास लेता दौड़ा आ रहा है , आते ही भूतल पर गिर पड़ा और रोते हुए बोला -" महाराज मेरी रक्षा कीजिए , मेरा सर्वनाश हो रहा है, मेरे दुशाले के गट्ठर में आग लग गई है | मैं आपकी जमात के सभी साधुओं को सात दिन पर्यन्त खिलाऊंगा | गुरु महाराज बोले -" अच्छा तुम सात दिन जमात को खाना खिलाओगे , तुम्हारे दुशाले की आग बुझ गई है | केवल तुम्हारे दंड के लिए एक दुशाला जल गया | साधुओं की फिर कभी अवज्ञा न करना | उसी समय बनिए के घर से एक आदमी दौड़ता हुआ आया और बोला " महाराज जिस दुशाले में पहले आग लगती देखी गई थी उसको हमने नियंत्रण में कर लिया है , केवल एक दुशाला नष्ट हुआ है और आग बुझ गई है |" बनिया तत्काल ही गुरुदेव को साष्टांग दण्डवत कर साधुओं के भोजनार्थ प्रबंध करने चला गया |
मैंने गुरुदेव को साष्टांग दण्डवत कर हाथ जोड़कर निवेदन किया -" महाराज इस विचित्र घटना से मैं बड़ा ही विस्मित हुआ हूँ , मेरे सुनने के योग्य हो तो कृपया इसका भेद मुझे बतावें | वे प्रसन्न होकर बोले -" बेटा इसमें विस्मित न होना , योगीश्वर लोग सब प्रकार की विद्याओं में कुशल होते है , प्रयोजन पड़ने पर उसका प्रयोग करते है | वह बनिया सज्जन है , केवल धनमद में गर्वित होकर धर्मपथ से भ्रष्ट हो रहा है | दंड पा कर अब से वह विनीत होगा और नाना प्रकार के धर्मानुष्ठान करेगा | जिस विद्या के द्वारा उसके कल्याण के लिए आज मैंने उसको दंड दिया, उसका नाम कालाग्नि विद्या है | उसे तुमको मैं सिखलाऊंगा , पर उसे गुप्त रखना और कभी अपात्र को न सिखलाना|"
जीवनी आगे जारी रहेगी........ |
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