श्री 108 श्री स्वामी रामदासजी काठिया बाबा का जीवन चरित्र | Part 02

  एक बार  विचरते हमलोगों को कुछ दूर पर छोड़ गुरु महाराज ने भूपाल ताल पर जा अपना आसन स्थापित किया और उसपर बैठ कर उन्होंने बड़े वेग से शंख -ध्वनि की | समीप ही ताल की दूसरी ओर एक मुसलमान  नवाब का निवास स्थान था | उसने कुछ दिन पूर्व यह घोषणा की थी कि उसके निवास स्थान के निकट कहीं  भी  शंख अथवा घंटा की ध्वनि न हो | जो कोई ध्वनि करेगा उसका सर काट दिया जाएगा | गुरूजी के जोर से शंख बजाने  से  उसकी ध्वनि नवाब के कानों में पहुंची | तब उसने  अपने अनुचरों को यह आज्ञा दी कि -"जाकर देखो , कौन मेरी आज्ञा की अवज्ञा कर शंखध्वनि कर रहा है |" तत्काल ही नवाब के अनुचरों ने द्रुतवेग  से ताल पर जा कर देखा  कि गुरुदेव हाथ में  शंख लिए बैठे है  और वे तुरंत लौट कर नवाब से बोले  -" एक जटाजूटधारी तेजस्वी योगी ने शंख बजाया  है |" इसपर नवाब ने कहा -" वह इतना धृष्ट है कि मेरी आज्ञा का उलंघन कर मेरे घर के समीप ताल पर बैठ कर शंखध्वनि कर रहा है | तुरंत जाकर उसके मस्तक को काट डालो या उसको पकड़ कर मेरे पास लाओ |" नवाबसाहब के अनुचरगण अस्त्र शस्त्र  लेकर जहाँ गुरुदेव बैठे थे उस स्थान पर गए , किन्तु वहां जाकर उन्होंने देखा कि वहां कोई जीवित मनुष्य नहीं है , पर उस साधु का सर एक स्थान पर , हाथ एक स्थान पर , पैर  एक स्थान पर इस प्रकार से शरीर खंड खंड होकर अलग अलग स्थान पर पड़ा है | ऐसा देख कर अनुचर लौट गए और नवाब से कहा कि उनलोगों के पहुंचने से पहले ही किसी दूसरे ने साधु के शरीर को खंड खंड कर के काट डाला है | किन्तु उसी समय ही फिर गुरुदेव ने जोर से शंखध्वनि की | उसे सुनकर नवाब ने अनुचरों को फिर वहां भेजा | इस बार अनुचरों ने वहां आकर देखा कि उस स्थान पर न तो कोई साधु है और न देखे हुए साधु के शरीर के खंड खंड ही | तब वे लोग विस्मित होकर नवाब के पास लौट गए और ये सब बातें कही | किन्तु उसी समय ही फिर उसी स्थान से शंख ध्वनि सुनाई दी | तब नवाब भयभीत हुए और विचारने लगे कि जो शंखध्वनि कर रहे हैं , वे कोई  असाधारण शक्तिसम्पन्न सिद्ध महापुरुष होंगे , अतः उनसे विरोध करना संगत  नहीं है | वे शाप दे कर राज्य में कोई  विघ्न उत्पादन न करें इस विचार से उनको प्रसन्न करने के लिए नवाब साहब ने दो अमात्यों के  साथ उस स्थान पर स्वयं उपस्थित होकर देखा की वहां जटाजूटधारी दीर्घकाय एक योगीपुरुष हाथ में शंख लिए हुए बैठे हैं |  नवाब साहब और उनके  अमात्यों ने  उन योगीश्वर का अभिवादन करके क्षमा प्रार्थना की और कहा कि " आप का जो अभिप्राय हो उसे पूर्ण करने की आज्ञा हमें दीजिए |" तब गुरुदेव ने कहा  -" तुमने जो शंख -घंटा बजाने  का निषेध किया है , यह अतिशय अन्याय है , तुम मुसलमान हो , अपने धर्म का पालन करो , किन्तु हिन्दू अपने धर्म का पालन करेंगे , इसमें तुम क्यों बाधा  डालते हो ? अपने उस आदेश को तुम लौटा लो और मैं  इस ताल के  पास एक मंदिर का निर्माण कराऊंगा उसमे तुम कोई बाधा  मत डालना |" नवाब "ऐसा ही होगा "कहकर गुरुदेव का अभिवादन करके अपने मंत्रियों  के साथ  अपने भवन को लौट गया | उसके पश्चात गुरुदेव ने उसी स्थान पर मंदिर का निर्माण कराया | तब से वही भूपाल -ताल मेरा गुरुद्वारा हुआ है | 


इस प्रकार सद्गुरु की शरण पाकर मैं प्रफुल्लित मन से और निष्ठा  के साथ उनकी सेवा करता हुआ उनके उपदेश का पालन करने लगा | गुरुदेव ऐसे उपदेश मुझको देते थे जिनके पालन करने से मैं सच्चा साधु बनूँ | मोह माया का कोई भी प्रभाव उनपर न था | मेरे लिए यह उपदेश था कि मैं संध्या के पश्चात धूनी चेताकर उसके निकट अपना आसान लगाऊं और उसी पर बैठ कर रात भर भजन किया करूँ तथा संध्या बीतने  पर और किसी के पास न जाऊं | उन्होंने केवल तीन हाथ लम्बा वस्त्र मुझे दिया था | नियम यह था कि सामने धुनि हो जिसकी आंच से शरीर गर्म रहे और कपडे को दोहराकर पीठ की ओर कंधे से निचे लटककर उसपर जटा फैला दूँ ; इस प्रकार पीठ को जाड़े बचाऊं | जो वस्त्र गुरुदेव ने मुझे दिया था उससे यदि पैरों को ढांक मैं पैर पसार कर सोता तो छाती से सिर तक खुला रहता और यदि सिर ढँक लेता तो पैर खुले रहते थे | इसलिए शीत से कांपते हुए पुनः उठकर बैठना पड़ता था | यों  ही सारी रात आसन पर बैठ कर भजन करना पड़ता था | 

         उन्होंने मेरी कमर में मोटी और भारी लकड़ी का आड़बंद (कमरबंद ) और लकड़ी की लंगोटी विधिपूर्वक धारण करने के मंत्रोपदेश के साथ पहना दिए थे | सोते समय यह लकड़ी का आड़बंद बहुत दिनों तक मुझे कष्ट देता था | यद्दपि अब इस आड़बंद के कमर में रहते हुए लेटने का मुझे अभ्यास हो गया है , तथापि पहले यह भी मेरे रात के लेटने में बहुत बाधा डालता था | दिन में दोपहर के समय प्रसाद पाने के पश्चात (अहोरात्र में एक ही बार आहार का नियम था ) कुछ देर तक बालुकामय स्थान में जाकर मैं आड़बंद की लकड़ी को बालू में घुसा देता  था ; उससे समस्त शरीर समतल बालू पर रहता था और उससे उस समय सोने में कष्ट नहीं होता था | इस प्रकार से मैं कुछ समय सो लेता था | गुरुदेव शिष्यों पर कठोर शासन करते थे | शासन की कठोरता से उनके सभी शिष्य क्रमशः उनका संग छोड़कर चले गए थे | केवल एक मैं ही उनके संग रह गया था |

उनका शासन कैसा कठोर था, अन्य घटनाओं का वर्णन करते हुए रामदासजी महाराज आगे कहते हैं :- 

एक दिन उत्तराखंड में जाड़े की रात में धूनी के समीप बैठ कर मैं भजन कर रहा था पर तामस आलस्य के कारण मुझे निद्रा आ गई ।मैं विवश होकर धीरे धीरे सो गया,निद्रा से अभिभूत हो जाने से कुछ समय तक मेरा चैतन्य नहीं रहा । वहां बर्फ पड़ रही थी , इसलिए धुनि अपने आप थोड़े देर में बुझ गई । धुनि बुझ जाने से कुछ देर में इतना शीत मेरे शरीर में प्रविष्ट हुआ की शरीर कांपने लगा , इसलिए अपने  आप  मेरी नींद टूट गई ।  मैं कांपते कांपते उठ बैठा । मैंने देखा कि धुनि बुझ गई है , और चारो ओर बर्फ पड़ रही है।  धुनि में अग्नि ज्वलित न करने से मृत्यु निश्चित अनिवार्य है ।  मैं विचार करने लगा कि क्या करूँ। गुरु महाराज ने मना कर रखा है कि रात में आसन को छोड़कर दूसरे किसी के पास नहीं जाना और उनके पास जाना भी निषिद्ध है। उनके पास जाकर आग मांगने से वे जान  जाएंगे की मैं भजन को छोड़कर सो गया  था , इसलिए वे मुझे इस अपराध का दंड देंगे। किन्तु यदि आग न लाइ जावे तो ठंड से शरीर  बर्फ हो जाएगा और मेरी मृत्यु निश्चित होगी। यह सब सोच विचार कर मैंने अंत में स्थिर निश्चय किया कि गुरुमहाराज चाहे जितना  ही दंड क्यों न दें उनके पास ही आग मांगने को जाऊँगा। उनको धोखा देकर किसी दूसरे के पास मैं नहीं जाऊँगा। तब मैं धीरे -धीरे चलकर उनकी झोपड़ी के द्वार पर जाकर खड़ा हुआ। उन्होंने तत्काल ही पूछा -" बहार कौन खड़ा है ?" मैं बोला - " महाराज मैं रामदास हूँ ।"  उन्होंने कहा -" तू रात्रि में अपने आसन को छोड़कर यहाँ क्यों आया है ?" मैंने कहा-" महाराज मेरी धुनि बुझ गई है , मैं थोड़ी आग लेने आया हूँ ।"  वे बोले -" तू सो गया था , नहीं तो तेरी धुनि कैसे बुझी ? तू क्या सोने के लिए अपने माँ बाप को रुलाकर घर बार छोड़कर आया है ? यदि इस प्रकार सोकर रात्रि व्यतीत करनी हो तो घर में सुख से सो सकता था। माता -पिता को कष्ट देने की क्या आवश्यकता थी ?" ऐसी नाना बातें कहकर गुरुदेव मुझे डाँटने लगे। मैंने काँपते -काँपते कहा -"महाराज मुझसे अपराध हुआ है , अचानक निद्रा ने आकर मुझे अचेतन कर डाला , कृपया मेरा अपराध क्षमा कीजिए ; मैं अब से विशेष सावधान रहूँगा।"  यह सुनकर उन्होंने अत्यंत तेजस्विता के साथ मेरा तिरस्कार करते हुए कहा -" तू जहाँ है वही घडी भर खड़ा रह , इस समय आग नहीं मिलेगी ।" .गुरुमहाराज की महिमा से मैं अवगत था , इसलिए मुझमे यह सामर्थ्य नहीं थी कि उनके आज्ञा को न मानूँ।  मैं वही खड़ा रहकर जाड़े से काँपने लगा।  कुछ समय पश्चात गुरुदेव ने अपनी धुनि से एक जलता  हुआ कोयला बाहर फेंक  कर कहा - "इस बार इसे ले जा , फिर कभी ऐसा ना हो ।'' कोयले को ले जाकर मैंने फिर अपनी धुनि चेताई और आसन पर बैठ कर भजन करने लगा । 

एक दिन गुरुदेव मुझसे बोले -" किसी प्रयोजन से मैं एक जगह जाऊँगा , मैं जब तक न लौटूं तब तक तू यहाँ बैठा रह सकेगा ? पर जब तक मैं न लौटूं तब तक यहाँ से किसी कारणवश उठकर और कहीं न जा सकेगा ।"  मैंने कहा -" आपका आदेश मैं प्राणपण अवश्य पालन करूँगा ।"  तब एक स्थान को दिखलाकर वे बोले -" मेरे न लौटने तक तू यहाँ बैठा रहना ।" यह कहकर वे चले गए।  मैं उनके लौटने की बाट देखता हुआ उसी स्थान पर बैठा रहा। क्रमशः दिन पर दिन व्यतीत होने लगे , किन्तु वे नहीं लौटे।  अंत में आठवे दिन वे लौटे।  तब मैंने खड़े होकर उनको प्रणाम किया। उन्होंने पूछा -" बेटा  तू यहीं बैठा था ? मैंने हाथ जोड़कर कहा -" हाँ महाराज आप इस स्थान से जब चले गए तब से अभी तक मैं यहीं बैठा हूँ ।" वे बोले -" शौचादि क्रिया के लिए भी क्या तू उठकर यहाँ से कहीं नहीं गया था ? " मैंने कहा -" जी नहीं , आपकी कृपा से मुझको ऐसी कोई आवश्यकता नहीं पड़ी। उन्होंने कहा -"तूने कुछ खाया भी नहीं ? " मैंने कहा -" जी नहीं , मुझे कुछ आहार नहीं मिला।"  तब उन्होंने प्रसन्न होकर कहा " बेटा ! गुरु की आज्ञा इसी प्रकार से पालन करनी चाहिए , माता पिता को रुलाकर घर छोड़ आकर गुरु की आज्ञा को इसी प्रकार तन-मन- वचन से पालन करने से ही भगवान प्रसन्न होते है और माता -पिता को रुलाना सार्थक होता है ।

          गुरुदेव शिष्यों की कठिन परीक्षा भी करते थे। एक बार वे एक नगर से थोड़ी दूर पर एक जंगल में अपना आसन लगाए थे। हम उनके तीन - चार चेले उनके साथ ही थे। चेलों में और सब मुझसे उम्र में बड़े थे। एक दिन अर्धरात्रि के पश्चात गुरुदेव ने हम सब चेलों को बुलाकर कहा -" इस जंगल से थोड़ी दुरी पर जो नगर है , तुम में से कोई अभी वहां जाकर दो रुपये का गांजा खरीद कर लाओ।"  रात्रि अँधेरी थी और जंगल में भांति-भांति के हिंसक जंतु रहते थे। इसलिए इतनी रात्रि में चेलों में से किसी ने जाना नहीं  चाहा।  तब मैं बोला  -" महाराज आपकी आज्ञा हो तो मैं जाने के लिए प्रस्तुत हूँ ।"  वे प्रसन्न होकर बोले -" अच्छा तू ही जा ; नगर में जाते ही  दो रुपये तुझे मिल जाएंगे उससे गाँजा खरीद कर लाना । मुझे यह दृढ विश्वास था कि गुरुदेव का कार्य करने से मुझे किसी प्रकार का भय या विघ्न उपस्थित नहीं होगा। इसलिए मैं प्रणाम कर  निर्भय जंगल - मार्ग  को अतिक्रम करके शहर में प्रविष्ट हुआ। शहर में प्रविष्ट होकर देखा कि सब दुकानें बंद है और सन्नाटा छाया हुआ है। राजमार्ग पर से जाते जाते कुछ देर में देखा कि थोड़ी दुरी पर एक घर में प्रकाश दिखाई दे रहा है। मैं धीरे- धीरे ज्योहीं उसके दरवाजे के सामने गया  त्योहीं एक आदमी ने मुझे देखकर प्रसन्नवदन घर से बाहर निकल कर मुझको दण्डवत किया और कहा -" महाराज आपने आज मुझपर बड़ी कृपा की है। किसी साधू को मैं दो रुपये भेंट दूंगा यह संकल्प करके कोई साधु मिले या नहीं इस उद्देश्य से प्रतीक्षा कर रहा था ; मेरा बड़ा भाग्य है कि आप इस समय यहाँ पधारे। मेरे  संकल्पित  दो रूपये को ग्रहण कीजिए। मैंने तब उन दो रुपयों को ग्रहण करके मन ही मन श्री गुरुदेव को स्मरण कर उनकी महिमा जानकर दंडवत किया , तत्पश्चात मैंने गांजा बेचने वाले की दुकान पर जाकर उसे जगाया और उससे उन दो रुपयों का गांजा खरीदा। उन दिनों मेरा अपना भी गांजा पिने क यथेष्ठ अभ्यास था। इसलिए उस गांजे से कुछ गांजा एक चिलम में चढ़ाकर मैं पी लिया और अवशिष्ट गांजे को लेकर गुरूजी के पास आया और उसे उनके सामने रखकर उनको दण्डवत किया।  गुरूजी बोले -" बेटा क्या गुरूजी का  कार्य इसी प्रकार  किया जाता है ? अग्रभाग  स्वयं पीकर अवशिष्ट क्या गुरूजी को देना चाहिए ? ऐसी ही क्या तुम्हारी शिक्षा हुई है ? उनकी इस बात को  सुनकर मैं निर्वाक होकर रह गया। मैं समझ गया कि गुरुदेव यथार्थ ही अंतर्यामी और सर्वज्ञ हैं , कोई दूरत्व भी उनकी दृष्टि का अवरोध नहीं कर सकता।  तब मैंने हाथ जोड़ भयभीत होकर कहा - " प्रभो मैंने अपराध किया है , मैं अबोध बालक हूँ , आपकी महिमा को न जान सका , मेरे अपराध को कृपया क्षमा कीजिए , मैं कभी भी  फिर ऐसा काम नहीं करूँगा। "  तब प्रसन्न होकर गुरुदेव ने कहा -" अच्छा , तुम बालक हो , तुम्हारे अपराध  को इस बार मैं क्षमा करता हूँ , और कभी ऐसा काम नहीं करना ; यह निश्चित समझना कि गुरू से किसी भी कार्य या चिंता को गोपन नहीं किया जा सकता।"  तब मैंने अपने कान अपने हाथ  से पकड़कर मन ही मन कहा कि गुरुदेव सर्वज्ञ भगवान है , मैं कभी भी उनकी मर्यादा का लंघन  नहीं करूँगा और यह प्रतिज्ञा की कि इनके चरणों का परित्याग मैं कभी नहीं करूंगा ।

इस प्रकार दृढ़व्रत होकर गुरुदेव का आदेश पालन करते हुए उनकी सेवा में मैं संलग्न हो गया उन्होंने कृपापूर्वक मुझे क्रमशः हठयोग की समस्त क्रियाओं  के साथ अष्टांगयोग की शिक्षा दी तथा प्रयोगप्रणाली के साथ सब प्रकार के मन्त्रों का उपदेश भी दिया और जिससे की मेरे क्रोध , अभिमान आदि का दमन हो इसके लिए वे समय समय पर  मुझपर नानाप्रकार से शासन भी करते थे तथा  यंत्रणा देने वाले और  जगाने वाले वाक्यों के द्वारा मेरा तिरस्कार भी करते थे सामान्य या कल्पित कारणों का बहाना करके मेरे प्रति अपशब्दों का प्रयोग करते थे। इससे यह परीक्षा लेते थे कि उसके द्वारा मेरा क्रोध या अभिमान जागता है या नहीं, कभी नाना प्रकार के स्वादिष्ट खाद्य - वस्तु मेरे सामने में रखकर परीक्षा लेते थे कि मेरा उसके प्रति लोभ होता है या नहीं  कभी- कभी मुझे  भूखा रखकर यह परीक्षा करते थे  की क्षुधा से मेरी धर्मबुद्धि विलुप्त होती है या नहीं। मुझ पर उनका मायारहित स्नेह इतना अधिक था कि मेरे कल्याण  के लिए इस प्रकार  कठोर व्यवहार करने में वे कुंठित नहीं होते थे ।

इस प्रकार  निकट रहकर मैं वर्ष पर वर्ष व्यतीत करने लगा।  मैं उनको भगवत्स्वरूप देखता था और समय समय पर उनके प्रभाव और महिमा को देखकर विस्मित हो जाता था । इस प्रकार बहुत वर्ष व्यतीत होने पर  गुरुदेव भीषण रुद्रमूर्ति धारण करके हाथ में डंडा लेकर अचानक मेरे सामने आकर  खड़े हुए और उस डंडे से मुझे पीटते पीटते भांति भांति के गालियां देकर मुझसे कहने लगे - " मेरे बड़े -बड़े सभी चेले चले गए , तू अकेला मेरे पीछे क्यों पड़ा है? तू मेरे पास से भाग जा। मैं किसी की सेवा नहीं चाहता हूँ। यह कहते कहते उन्होंने इतना मारा कि मेरा सारा शरीर फूल गया और समस्त शरीर में भीषण पीड़ा होने लगी मैं धीरे धीरे उठकर खड़ा हुआ और हाथ जोड़कर विनीत और स्थिर भाव से मैंने निवेदन किया - '' महाराज ! मेरी एक बात आप कृपा करके सुनिए , मेरे माता - पिता के घर में खाने पीने की कोई कमी नहीं है। मैंने अपनी इच्छा से माता- पिता को त्याग कर आपकी शरण ली है ; तब से आपको ही पिता , माता, भाई, बंधू और गुरु जानकर आपकी सेवा में पड़ा हूँ।  इस संसार में और किसी को भी मैं अपना नहीं जनता ; आप मुझे त्याग दें तो मैं और कहाँ जाऊं ? आप यदि मुझको त्यागना ही चाहें तो मैं यह अपना गला आपके समीप उपस्थित करता हूं , आप चाकू से इसे काटकर मेरा देहांत कीजिए। जीवित रहते मैं कभी आपको छोड़कर नहीं रहूँगा ।" 

मेरे इस निवेदन को सुनकर गुरुदेव प्रसन्न हुए और बोले - बेटा ! मैंने आज तेरी अंतिम परीक्षा ली , तू प्ररीक्षा में उत्तीर्ण हुआ , तेरी बुद्धि निश्छल हुई है , मैं  तुझपर  बड़ा प्रसन्न हुआ हूँ । तुझको मैं यह वरदान देता हूँ कि तेरा सर्वाभीष्ट पूरा होगा  तुझे भगवद्दर्शन प्राप्त होगा और तेरे पास ऋद्धि -सिद्धि सदा उपस्थित रहेगी। तू जिससे जो कहेगा वही सफल होगा, तेरा वाक्य कभी निष्फल नहीं होगा इत्यादि।"  इन सब वरदानों को पाकर मैं अवाक् होकर रह गया और गुरुदेव की परिक्रमा करके उनको मैंने साष्टांग दण्डवत प्रणाम किया | 

इसके कुछ दिनों के बाद एक दिन गुरुदेव ने एक बड़े नगर की सीमा पर जाकर अपना आसन स्थापित किया।  कुछ दुरी पर मैंने भी अपना आसन लगाया। नगर से बहुत लोग दर्शन करने के लिए आने लगे। उन में से एक ने मुझे प्रणाम करके चार रुपये की भेंट चढ़ाई। मैंने उससे कहा - तुम यह क्या करते हो ? मेरे गुरुदेव पास ही विराजमान हैं , तुम जाकर उनकी सेवा में यह भेंट चढ़ाओ।"  उसने कहा - " बाबाजी ! आप पर ही मेरी श्रद्धा हुई है , यह भेंट आपके लिए ही मैंने चढ़ाई है। मैंने कहा -" यह कभी नहीं हो सकता , योगीश्वर गुरुमहाराज के साक्षात् विराजमान रहते इस भेंट को मैं कभी नहीं ले सकता हूँ, इस भेंट को ले जाकर उन्हीं की सेवा में अर्पण करो। किन्तु वह मेरी बात को किसी प्रकार से भी न सुनकर मेरे ही सामने रखकर चला गया मैंने उसी समय हड़बड़ाते हुए उन रुपयों को लेकर गुरुदेव के सामने रख दिए।  उन्होंने मानो क्रोध से ही कहा -" अरे तू कैसा चेला है ! गुरु के सामने ही भेंट लेने लग गया ? मैंने हाथ जोड़कर कहा -" महाराज जी ! इस भेंट को मैं नहीं लेना चाहता था , उससे मैंने बार बार कहा  था उस भेंट को वह आपकी भेंट में उपस्थित करे, पर वह किसी प्रकार से भी मेरा कहना न मानकर भेंट को मेरे आगे रखकर चला गया।  जाने पर तुरंत ही इसे मैं आपकी सेवा में लाया हूँ ; मैंने इसे स्वयं नहीं लिया है। मेरी बातो को सुन गुरुदेव मुस्कुराकर बोले " बेटा तू भी अब सिद्ध हो गया।"  फिर मानो स्वतः कहने लगे - "तुम भी अब शेर हो गए , परन्तु दो शेर एक स्थान पर नहीं रह सकते। 

इस घटना के दो तीन दिन के बाद  गुरुदेव ने मुझसे कहा -"  बेटा , द्वारका अपने संप्रदाय का मुख्या धाम है, उस धाम का तुम्हारा एक बार दर्शन करके आना अत्यंत आवश्यक है।"  मैंने कहा -" बाबा! आपको ही मैं भगवान जानता हूँ, शास्त्र में भी है- गुरु के चरणों में समस्त तीर्थ विराजमान है; अतः आपके चरणों के दर्शन से ही मुझे सब तीर्थों के दर्शन होते है।  इसलिए और  किसी तीर्थ के दर्शन की मेरी इच्छा नहीं  है।"  गुरुदेव ने कहा -"अरे ! तू बड़ा ज्ञानी हो गया है ! तेरी भांति ज्ञानी और कोई कभी नहीं हुआ होगा ! तेरे गुरु द्वारका दर्शन को गए, दादा-गुरु गए और तू ऐसा ज्ञानी हो गया है कि तुझे किसी तीर्थ के दर्शन की आवश्यकता नहीं है। ऐसी बुद्धि को त्याग दे।  मैं कहता हूँ की तू द्वारका धाम के दर्शन करके आ।"  मैंने कहा - महाराज! मैं नहीं जानता की द्वारका कहाँ है , मैं कैसे द्वारका जाऊँगा? गुरुदेव चुप हो गए, मेरी इन बातों का उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। पर दूसरे ही दिन दो साधुओं ने गुरुदेव के पास आकर उनको दण्डवत प्रणाम किया।  उनसे गुरुदेव ने पूछा -"तुम कहाँ जाओगे ?" साधुओं ने कहा -" द्वारकाधाम के दर्शन को जा रहे हैं।"  मैं समीप ही था तब गुरुदेव ने मुझसे कहा ये  दोनों साधु द्वारकाधाम  जा रहे है, इनके साथ तुम भी द्वारकाधाम की यात्रा करो। "  तब मुझे विवश होकर द्वारकाधाम की यात्रा करनी पड़ी। मैंने गुरुदेव को साष्टांग दण्डवत प्रणाम कर उनसे विदा ले उन दो साधुओं के साथ द्वारकाधाम के लिए यात्रा की।   गुरुदेव ने मुझे आशीर्वाद देकर कहा -" तुम द्वारकजी के दर्शन कर आओ , मार्ग में तुम्हे कोई कष्ट न होगा, तुम्हे जिन- जिन वस्तुओं की आवश्यकता  होगी वे सभी तुम्हारी चेष्टा के बना ही तुम्हारे समीप आ जाएंगी।" 

वास्तव में मुझे द्वारकजी की यात्रा में कहीं किसी वस्तु का अभाव या या किसी प्रकार की असुविधा नहीं हुई | द्वारकाधाम में पहुंचकर मैंने द्वारकानाथ जी का दर्शन किया।  फिर श्री वृन्दावन आश्रम में लौटकर मैं जिस स्थान में गुरुदेव  रहते थे उसी स्थान पर उपस्थित हुआ और देखा की मेरे सभी बड़े गुरुभाई वहां उपस्थित हैं , सभी का शरीर विषण्ण है, पर वहां गुरुदेव नहीं है। मेरे पूछने पर गुरुभाइयों ने अतिशय कष्ट के साथ कहा-"तीन दिन गत  हुए गुरुदेव ने कलेवर छोड़ दिया है।"  इस दारुण संवाद को सुनते ही मेरा सर घूमने लगा। मैं जानता था की गुरुदेव भगवान है , ब्रम्हर्षि है और  जरा-मृत्युरहित है।  अतः गुरुभाइयों के द्वारा कही गई बातों पर मुझे जरा भी विश्वास नहीं  हुआ।  मैंने कुछ देर चुप रह कर गुरुभाइयों  से कहा -"गुरुदेव सर्वशक्तिमान भगवन थे , उनकी मृत्यु कैसे हो  सकती है ? आपलोग मुझसे झूठ कह रहे है।" उन लोगों ने कहा -"गुरुदेव ने हमलोगों के सामने ही शरीर छोड़ा है और हमलोगों ने उनके शरीर का अंतिम संस्कार भी किया है।"  यह सुनकर मैं अत्यंत विकल हो गया और बोला -"हाय ,इसलिए  उन्होंने मुझे अपने पास से हटा दिया था ? पर वे तो भगवान् है, उनकी मृत्यु कैसे संभव है ? उनके दर्शन न पाने से मैं अपने को  जीवित नहीं रखूँगा।"  मैं शोक से क्रमशः इतना अभिभूत हुआ कि अपने हाथ से अपने मस्तक की दीर्घ जटाओं को उखाड़ने लग गया। यह देखकर गुरुभाइयों ने दयाद्र होकर मुझे मुंडित करा दिया। किन्तु मैं शोक से अभिभूत होकर धरती पर लेटकर उपवास करके कालक्षेप करने लगा।  किसी के भी समझाने का कोई प्रभाव मुझपर नहीं पड़ा , केवल निरंतर रोते-विलापते ही मेरे दिन कटने लगे।  अंत में सातवें दिन गुरुदेव ने प्रसन्न होकर मुझे दर्शन दिया और मुझे सांत्वना देते हुए कहा -" बेटा ! तुम शोक मत करो , उठो तुम्हारा मंगल होगा , मेरी मृत्यु नहीं हुई है , तुम शांत होओ | यह सत्य है की मेरी मृत्यु  हुई है , किन्तु प्रयोजनवश मैंने आत्मगोपन किया है ; मृत्यु  की घटना जो इन सबको दिखलायी है , यह लीलामात्र है। समय समय पर तुमको दर्शन देता रहूँगा। मैं औरों से अलक्षित नर्मदा के तट पर रहता हूँ।  तुम शोक मत करो , उठो , साधुमार्ग में विचरण करो , तुम्हारी सभी कामनायें  सफल होंगी।" 

इस प्रकार से मुझे प्रबोधित कर गुरुदेव अन्तर्हित हो गए । उनके दर्शन और प्रबोधवाक्य से मेरा चित शांत हो गया। मैं  उठा और स्नान करके भोजन किया। मेरे बड़े गुरुभाइयों ने यथाविधि गुरुदेव का भंडारा किया और उसके बाद वे अपने अपने स्थान को पधारे। गुरुदेव समय - समय पर आविर्भूत हो मुझे दर्शन दते हुए अपने वाक्य को सत्य करने लगे।" 


जीवनी आगे जारी रहेगी........ |   

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