श्री 108 श्री स्वामी रामदासजी काठिया बाबा का जीवन चरित्र | Part 03

 गुरूजी के देहांत के पश्चात श्री रामदासजी ने बहुत कठोर तपस्या की। ग्रीष्मकाल में प्रचंड उत्ताप से लू चलती थी उस समय वे पंचाग्नि के अंदर बैठकर योग- साधना में निमग्न रहते थे।

एक समय श्री रामदासजी एक गांव में पंचाग्नि में बैठे हुए थे , गांव के लोग उनपर बड़ी श्रद्धा -भक्ति करने लगे। उनके साथ एक और  साधु था।  वह श्री रामदासजी से  ईर्ष्या करने लगा और उनका वध करने का संकल्प उसने किया। एक दिन श्री रामदासजी जब पंचाग्नि के बिच योगासन में  बैठकर तन्मय थे , उस समय उस साधु ने उनके चारो ओर लगभग एक सौ कंडो (मोटी लकड़ी ) को इस प्रकार से सजा दिया कि कंडों के घेरे ने उनके सर से  ऊँचा होकर उनको बिलकुल अलक्षित कर दिया। (ढक दिया )फिर उस साधु ने उन कंडों में आग लगा दी | जब अग्नि प्रज्वलित हुई तब चारो ओर कंडों की आग एक ही लौ से धधकने लगी। उस समय वह साधु भाग गया। गांव के लोगों ने वहां आकर धधकती हुई उग्रज्वाला देखकर सोचा कि अग्नि ने श्री रामदासजी को अवश्य ही भस्म कर दिया होगा।  जब समस्त कंडे जल गए , अग्निज्वाला बुझ गई और उनका भी ध्यानभंग हुआ तब देखा गया कि उनके शरीर पर अग्निदेव का कुछ भी प्रभाव न पड़ा था। ध्यानभंग होने पर वे कंडों के भस्म की उस ढेर के बिच से  आए।  गांव के लोग यह  देखकर अत्यंत विस्मित हुए और धन्य-धन्य कहने लगे। श्री रामदासजी ने गांव के सरदार से कहा -"अब से मैं  नित्य हजार कंडों के बिच बैठकर धुनि तापूँगा।  तुमको प्रतिदिन मेरे लिए हजार कंडों का प्रबंध करना पड़ेगा। " सरदार बोले -"महाराज! मैं प्रतिदिन हजार कंडे कहाँ से  लाऊंगा?" उन्होंने कहा -"इतने कंडे आज तुमने कैसे दिए थे ? क्या मुझे भस्मीभूत करने की  इच्छा थी ? देखो, कंडों के बिच में भी मैं अखंड रह गया। अग्निदेव ने कृपा करके मेरे एक रोंया तक को भी नहीं जलाया। " सरदार ने कहा -"महाराज ! आपके संग के उस साधु ने हमलोगों से मांगकर इतने कंडे इकट्ठा किये थे।  हम नहीं जानते थे कि वह सब कंडो को ईर्ष्यावश आपको मार डालने के लिए एक संग जलाएगा।  इस समय न तो वह यहाँ दिखाई देता है और न उसका सामान ही। आप आज्ञा दीजिए , हम उसे अभी ढूंढ  लावें और उसको उपयुक्त दंड देने का प्रबंध करें। " श्री रामदासजी ने कहा -"न ,न, तुमको कुछ भी न करना पड़ेगा, वह अपनेआप दंड पावेगा। " इसके दो दिन के पश्चात पुलिस उसको  किसी और अभियोग में पकड़ कर ले गई और उसे छः मास का  कारावास का दंड मिला। 

ध्यान में बैठने के क्रम में अग्नि ने उनके शरीर को क्यों नहीं जलाया इस विषय में उन्होंने कहा है कि -" धुनि तापने  के लिए बैठने से पहले ही आत्मरक्षा के मंत्र से अग्नि के ताप को रोक देना होता है, जिससे अग्नि से शरीर की रक्षा हो।  जिसका शरीर अग्नि से दुःख पाता है वे मंत्र न जानने वाले कुयोगी हैं, मंत्रवित नहीं हैं।"  

श्री रामदासजी जिसप्रकार ग्रीष्मकाल में पंचाग्नि तापते  थे उसी प्रकार शीतकाल में जल-शय्या में अवस्थित रहते थे।  वे ब्रम्हमुहूर्त में ही  जल में योगासन लगाकर  मग्न हो जाते थे और लगभग छह दण्ड दिन चढ़ने पर  साधु लोग उन्हें जल से उठा  लाते थे और उनके शरीर में अग्नि का ताप देने पर उनमे बाह्य-चेतना का संचार होता था।  इस प्रकार से उन्होंने अनेकानेक कठोर तपस्याएं की थी। उन्होंने भारत के अनेक तीर्थों में विचरण  किया था। मानसरोवर से कन्याकुमारी तक सभी तीर्थों  का पुनः पुनः दर्शन पैदल चलकर किया था।

तीर्थों में भ्रमण के समय श्री रामदासजी को कई बार बड़े बड़े वनों में होकर जाना पड़ा था। हिंसक जंतुओं ने अनेकों  बार उनको देखा लेकिन कभी उनपर आक्रमण नहीं किया। एक बार वे कई दूसरे साधुओं के साथ एक वन से गुजर रहे थे जो हिंसक जन्तुओ से भरा हुआ था। वे बाकी साधुओं से पीछे चल रहे थे।  सब से आगे जो साधु जा रहे थे वे हिंसक जंतुओं का गर्जन सुनकर बोले " मैं सबसे आगे न जा सकूंगा, मैं बहुत डर रहा हूँ।"  यह सुनकर श्री रामदासजी ने कहा -" मैं सबसे आगे हो लेता हूँ, तुम चाहो तो पीछे आ सकते हो।"  तब वे साधुजी पीछे हो लिए और श्री रामदासजी सबसे आगे होकर चलने लगे। किन्तु थोड़ी ही देर में  एक वृहत्काय बाघ आकर पीछे चलने वाले साधुजी पर झपटा और उनको लेकर प्रस्थान कर गया और सब महात्मा निर्विघ्न वन को पार कर एक बस्ती में आ पहुंचे।




भारत के उत्तराखंड में अनेकानेक वनों  में भी उन्होंने विचरण किया था।  उन्होंने उस समय की दो घटनाएँ इस प्रकार बताई थी। -" एक बार भगवान ने छल से साधु का वेश धरकर उत्तराखंड में मेरे साथ लगभक एक मास निवास किया था।  वे खाते - पीते कुछ भी नहीं थे अंत में वे एक दिन मुझसे बोले - '' मेरे साथ सैर करने चलो।"  मैं उनके  साथ चल दिया । दोनों एक नदी के ऊपर बने हुए पूल के ऊपर से जाने लगे, उन साधुरूपी भगवान ने आकाश की ओर  उंगली से दिखाकर कहा -" अब देखो ऊपर क्या है।"  मैंने ऊपर की ओर ताककर  देखा कि बड़ी ही काली घटा आकाश में उमड़ी हुई है। यह देख मैंने  कहा -" यह तो मोजविद्या का सा कर्म दिखाई देता है, यह एक प्रकार के जादू के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।"   वे साधु-रूपी  भगवान् और कुछ न कहकर आगे बढ़ने लगे, तो मैं भी उनके साथ चलने लगा। वे मुझे पीछे- पीछे चलने  का संकेत करके पूल के  निचे नदी में उतरे तो मैं भी उनके साथ नदी में उतरा।"  किन्तु यह बड़े भारी आश्चर्य की बात देखने को आई कि वहां उस नदी के बहुत गहरी होने पर भी हम दोनों पद्व्रज नदी पार हुए और घुटने के ऊपर जल नहीं पंहुचा।  हम दोनों चुपचाप नदी पार होकर एक जंगल से होकर जा रहे थे। वहां मैंने देखा कि पगडण्डी के दोनों ओर कहीं स्मशान में चिताएं जल रही है, कहीं शवसमुह पड़े है, कहीं कटे हुए मुण्ड  ही मुण्ड  पड़े है। ऐसे  नाना प्रकार के भीषण दृश्य देखते हुए कुछ दूर चलकर मैंने देखा कि वे साधुरूपी भगवान वहां नहीं हैं।  बहुत ढूंढने पर भी मुझे उनका फिर पता नहीं मिला। मैं वहां से लौटने लगा किन्तु पहले की देखी हुई चिताएं, शवादी कुछ भी मुझको दिखलाई नहीं दिए।  उन स्थानों पर केवल वन-जात नाना प्रकार के वृक्ष, लता आदि दिखलाई दिए। तब मैं निश्चित रूप से जान गया कि स्वयं भगवान ने साधु का वेश धारण कर मुझ को प्रतारित किया।

एक बार मैंने हरिद्वार के नकट स्थित चंडी पहाड़ के समीप के पहाड़ से उतरते समय पगडण्डी को छोड़कर चलते चलते एक निर्जन स्थान में एक साधु के दर्शन किये जो तीन सौ वर्ष के थे। उन साधु ने मुझे खाने के लिए फलमुलादि दे कर मेरा बड़ा आदर किया था और मुझे यह कह दिया था कि मैं और किसी को उनका संवाद न दूँ | पर उस निषेध को न मानकर मैंने हरिद्वार लौटकर अपनी जमात  के दूसरे साधुओं के पास उस घटना का वर्णन किया और उन साधुओं के कौतुहल के निवृति के लिए उनको संग ले कर वहाँ गया। किन्तु वहाँ जाकर देखा कि न तो वे साधुजी ही है और न उनके रहने की गुफा  ही।  विफल-मनोरथ लेकर वहाँ से लौटना पड़ा।

इस प्रकार तीर्थ भ्रमण तथा उत्तराखण्ड आदि भ्रमण कर के वे अंत में ब्रजधाम में ही स्थायी रूप से विराजने लगे।  वे कहते थे कि सब स्थानों की अपेक्षा  ब्रजमण्डल ही उनको अधिक प्रिय लगा और साधुओं के रहने  योग्य ऐसा कोई स्थान उनको प्रतीत नहीं हुआ। उन्होंने यह भी कहा था कि उत्तराखंड भी तपस्या के लिए स्थान अवश्य है, पर वहाँ कन्दमूल ही खा कर निर्वाह करना पड़ता है और वर्षा-काल  में यह अन्वेषण कर रखना पड़ता है कि वे कहाँ अंकुरित हुए हैं। इस प्रकार आहार की चेष्टा वहाँ भी करनी पड़ती है।  मैंने विचार किया कि ब्रजधाम ही सबसे अच्छा है, जहाँ आहार-संग्रह की चेष्टा नहीं करनी पड़ती है।  यहाँ साधुओं के योग्य खाद्य वस्तुएं सदा मिल जाती है, एतएव ब्रज में ही रहने का मैंने निश्चय किया।" 

भरतपुर  में सैलानी कुण्ड नामक एक कुंड है । ब्रज धाम में जाकर स्थायीरूप से बसने से पूर्व उसी कुण्ड के समीप एक स्थान पर श्री रामदासजी ने कुछ दिन अवस्थान किया था।  ऐसा माना जाता है कि उन्हें वहाँ भगवद्दर्शन लाभ हुआ था। और वे पूर्ण रूप से सिद्ध-मनोरथ हुए हैं। इसके सबंध में एक कहावत प्रसिद्ध है :-

                                                 रामदास को राम  मिला, सैलानी का कुण्डा 

संतन  तो  सच्ची  माने,  झूठी  माने   गुण्डा।।

उन्होंने भरतपुर में पहले पहल चेले बनाना प्रारम्भ किया। वहाँ के एक सद्वंशजात और अत्यंत निष्ठावान ब्राम्हण ने सबसे पहले अपने पुत्र को लाकर श्री रामदासजी का चेला बनवाया था जो गरीबदास से नाम से प्रसिद्ध  हुए।  उन्होंने बाल्यावस्था से देहान्त तक श्री रामदासजी के साथ रहकर बड़े यत्न और निष्ठा से उनकी सेवा करके सिद्धिलाभ किया।  उनका चरित्र ऐसा निर्मल था और वो ऐसे त्यागी तथा प्रेमी थे कि सभी साधुगण उनपर श्रद्धान्वित रहते थे और उनके विनम्र स्वभाव, धैर्यगुण, गुरु की सेवा में सर्वप्रकार कष्ट-सहिष्णुता और  सर्व-प्रति दया आदि गुणों की एक वाणी से प्रसंशा करते थे। उनका मुखमण्डल ऐसा प्रशान्त था कि उनको देखने से ही मालुम होता था कि वे एक असाधारण पुरुष है और मानो वे शान्ति के सागर हैं उनको देखने  से  ही चित्त प्रशान्त होता था।

इनके पश्चात श्री रामदासजी के श्री भगवानदासजी, श्री ठाकुरदासजी और श्री नरोत्तमदासजी ये तीन और साधु-शिष्य हुए थे ।

श्रीभगवानदासजी कुछ दिन गुरूजी की सेवा करने के पश्चात साधन भजन करके अंत में बम्बई के बहुत ही निकट एक स्थान में महंत होकर रहते थे ।

श्री ठाकुरदासजी बड़े ही विद्वान थे और तीव्र वैराग्य के कारण परमहंस-वृत्ति अवलम्बन करके उत्तराखंड में चले गए थे।  तब से उनका कोई संवाद और नहीं मिला।

भरतपुर के एक और निष्ठावान  तपस्वी ब्राम्हण ने अपने पुत्र को श्री रामदासजी के चरणों में अर्पण कर दिया था।  उन्होंने उनके पुत्र को साधु-चेला बनाया और उनका नाम "नरोत्तमदास" रखा। श्री नरोत्तमदासजी एक दिन कुऍं से जल लाने गए।  जल उठाने के समय गुरूजी का कमण्डलु कुएँ में गिर गया, जिससे ताड़ना के भय से वे भाग गए, और उसके पश्चात उन्होंने अपने आप साधन भजन करके प्रतिष्ठा लाभ की।  उनके साथ अनेक साधु रहते थे और वे बड़े भारी  जमात लेकर सदैव विचरण करते थे और महंतोचित्त सम्मान पाते थे।

श्री नरोत्तमदासजी अपने गुरु के साधनशक्ति का वर्णन करते हुए कहते है की -" जब मैं उनसे मिला तब तक वे सिद्ध हो चुके थे उनके साधन की स्थिति मैंने नहीं देखी। अपने बाल्यावस्था में उनकी सेवा में रहते समय मैं उनको केवल एक ही क्रिया करते कभी-कभी देखता था। महीने में एक या दो बार किसी दिन गरीबदासजी को और किसी दिन मुझको साथ लेकर वे किसी न किसी जंगल में जाते थे।  उस समय मेरे पास एक बड़ा सा गिलास रहता था।  उस गिलास को उत्तम जल से भर कर लाने को वे हम लोगों से कहते थे। उस गिलास में करीब आधा सेर जल आता था। उस जल को वे लिंगेन्द्रिय से सब खींच लेते थे और कुछ समय पश्चात पेशाब करने की रीति से उसे फिर गिलास में निकाल  देते थे। उन्होंने पहले से जो आज्ञा दे रक्खी  थी,  उसके अनुसार मैं रुई की ऐसी बत्ती बनाकर वहां ले जाता था जैसी रति के समय लगती  है। खींचे हुए जल को पेशाब की रीति  से छोड़कर गुरूजी कहते -"बत्ती को जलाकर जल में रक्खो और देखो बिना बाधा के बत्ती जलती रहती है की नहीं ।"  उनकी आज्ञा से मैं वैसा ही करता था। घी से भरे हुए गिलास में रखने से जैसे बत्ती निःशब्द जलती है, ठीक वैसे ही बिना रुकावट के वह बत्ती उनके लिंगनिर्मुक्त उस जल से जलती रहती थी। बत्ती का स्थिर भाव से जलना अपनी आँखों से देखकर वे आसन पर  लौटते थे। उनकी एक यही क्रिया मैनें देखी है। इसको छोड़ उनकी और कोई भी क्रिया मैंने नहीं देखी।"

सिद्धिलाभ के पश्चात समय-समय  पर श्री रामदासजी का अलौकिक योगैश्वर्य प्रकाशित होता था।  उनके योगैश्वर्य की कुछ घटनाए यहाँ वर्णित की गई हैं । 

सिपाही-विद्रोह (ग़दर ) के समय एक बार यमुनाजी के किनारे के एक पथ से श्रीरामदासजी आगरा जा रहे थे। उन दिनों यमुना जी में गोरों का एक जहाज़ था। उस जहाज़ पर से उनको यमुनाजी के किनारे देखकर उनकी ओर एक गोरे ने बन्दुक तान गोली चलायी। गोली श्री रामदासजी के गण्ड  के निकट होकर निकल गयी। गोरे ने फिर गोली चलाई, जो उनके गण्ड के दूसरे ओर से निकल गई। गोरे  ने फिर भी गोली चलाने  के लिए बन्दुक उठायी, तब श्री रामदासजी ने मन ही मन कहा "यह तो छोड़ेगा नहीं देखता हूँ।"  यह कहकर उन्होंने आँखे बंद कर ली। किन्तु तत्काल  ही बन्दुक गोरे के हाथ से छूटकर यमुनाजी में गिर पड़ी । तब सब गोरे विस्मित होकर मेमों के साथ समीप आकर सर से टोपी उतार- उतार  कर सलाम करने लगे। उन लोगों ने फिर रामदासजी के साथ कोई अनिष्ट आचरण नहीं किया।

श्री रामदासजी एक बार विचरते हुए हाथरस पधारे।  वहाँ एक बड़े जमींदार के कोई पुत्र नहीं था।  जमींदार ने बड़े यत्न से उनकी सेवा की और अंत में विनती की -" महाराज ! मेरा पुत्र नहीं है आप ऐसी कृपा करें कि मेरा पुत्र हो जाए।"  श्री रामदासजी ने कहा -"अच्छा, तुम वृन्दावन में मेरे लिए एक ठाकुरजी का मंदिर बनवा देने का वचन दो तो तुम्हारा पुत्र होगा।"  जमींदार ने कहा -"मेरा पुत्र हो तो मैं अवश्य वृंदावन में मंदिर बनवा दूंगा।"  श्री रामदासजी ने कहा -" वर्ष भर के भीतर तुम्हारा पुत्र होगा, पर   यदि मंदिर न बनवाओगे तो तुम्हारा पुत्र न रहेगा।  मैं एक वर्ष के पश्चात फिर तुम्हारे यहाँ आऊंगा ।"  तत्पश्चात उस जमींदार की पत्नी गर्भवती हुई और नियमित समय पर उसका पुत्र उत्पन्न हुआ। वर्ष बीतने  पर श्री रामदास जी फिर जमींदार के घर पधारे।  उसने उनका सत्कार किया और पुत्र लाभ का आनंद भी प्रगट किया, पर वह  वृन्दावन में मंदिर बनवाने को प्रस्तुत नहीं हुआ। उसने कहा -"मेरा यह बड़ा भरी उद्यान है। इसी में मैं मंदिर बनवा दूंगा, आप यहीँ निवास करें।"  यह सुनकर श्री रामदासजी महाराज ने कहा -" तूने वृन्दावन में मंदिर बनवा देने का वचन दिया था, पर पुत्र पाने से गर्वित होकर तूने अपनी प्रतिज्ञा का उलंघन किया है।  इसलिए आज से तीसरे दिन तेरा पुत्र मर जाएगा। " यह कहकर उन्होंने उस जमींदार के स्थान से  थोड़ी दूर चलकर अपना आसन स्थापित किया।  वास्तव में तीसरे ही दिन उस जमींदार का पुत्र मर गया, जिससे उसकी स्त्री शोक के मारे रोती  हुई अंतःपुर से निकलकर श्री रामदासजी के आसन के समीप उपस्थित हुई और उनके चरणों के आगे धरती पर लोटती हुई रो-रोकर कहने लगी -"महाराज ! मेरे स्वामी के अपराध को क्षमा कीजिए।  मैं पुत्रहीना थी आपकी ही कृपा से मेरा पुत्र हुआ था, पर मेरे स्वामी ने कुबुद्धि के कारण आपकी अवज्ञा की है, जिससे मेरा बेटा मर गया, परन्तु मैंने कोई अपराध नहीं किया है, मुझ पर आप कृपा कीजिए । आप मुझे जो आज्ञा देंगे वही मैं करुँगी।  इस प्रकार आर्तनाद करते रहने से श्री रामदासजी दयाद्र होकर बोले -" अच्छा,तेरा पुत्र मरा है, मेरे वाक्य से फिर तेरे दो पुत्र होंगे और जीवित रहेंगे।  मैं तुमलोगों से कुछ भी नहीं चाहता, पर साधु को वचन देकर फिर कभी उसका उल्लंघन नहीं करना।" 

तदनन्तर श्री रामदासजी वृन्दावन लौटकर पहले केमारवन के दावानल-कुण्ड आश्रम में कुछ दिन रहे।  उन दिनों अनेक साधु उस आश्रम में रहते थे। श्री  रामदासजी  वहां रहकर बड़े- बड़े बरतनों को मलते और साधुओं की सेवा के लिए तीन-चार मन लकड़ी वन से काटकर सर पर लाते थे। इस प्रकार वे वहाँ कुछ दिन रहकर फिर वे यमुनाजी के तीर पर श्रीगंगाजी की गली के सामने वाले घाट पर एक वृक्ष के निचे आसन लगाकर रहने लगे और श्री गरीबदास जी उनके साथ रहकर सदा उनकी सेवा करने लगे। 

उस घाट पर बहुसंख्यक स्त्री-पुरुष नित्य आकर नहाते थे।  कुछ ब्रजवासियों ने विचारा कि इस घाट पर बहुत स्त्रियां सदा आती है और यह साधु यहीं रहते हैं, इनकी परीक्षा करके देखना चाहिए कि यह कैसे साधु हैं। इस विचार से एक दिन गंभीर अंधकारमयी अर्धरात्रि के समय जब सब लोग सो गए, तब उन लोगों ने एक युवती को उनके समीप भेजा।  श्री रामदासजी अपने आसन पर लेटे हुए थे।  ऐसे समय में वह युवती धीरे- धीरे उनके आसन पर जाकर लेट गई और उनसे लिपट गई। श्री गरीबदास जी लगभग बीस हाथ की दुरी पर अपने आसन पर सोते थे। वह युवती जब उनसे लिपटी तब उन्होंने गरीबदास को बुलाकर कहा -"गरीबदास ! यहाँ आ जा , दिया जलाकर देख, मेरे आसन पर कौन आ गया है।"  गरीबदास जी ने उठकर दिया जलाया तो उस युवती को अपने आसन  पर देखकर उन्होने कहा -"तू कौन है ?"  उस युवती ने कहा -"महाराज ! मैं काम से बड़ी विवश हुई हूँ, जिससे तुम्हारे समीप आयी हूँ, मैं विधवा हूँ, मेरा कोई नहीं है।"  उन्होंने कहा -"तेरा काम हुआ है तो किसी गृहस्थ के पास चली जा, यहाँ गृहस्थ बहुत है ।"  युवती बोली -" महाराज ! तुम पर मेरा मन बहुत चलने लगा है। तुम ही मुझपर कृपा करो।"   इसपर क्रुद्ध होकर उन्होंने कहा -" गरीबदास ! तू यहाँ से जरा हट जा, मैं इस राँड़ को साधु की कुछ करामात दिखा दूँ। यह साधु का सत्व  खिंच लेना चाहती है। मैं इसे दिखा दूंगा की साधु का रमण कैसा होता है। घंटे भर के बिच मैं इसकी जान खिंच लूंगा, तब इसको मालुम पड़ेगा की साधु का सामर्थ्य क्या होता है।"  यह कहकर उन्होंने उस युवती से कहा -"अब आ जा तू मेरे पास।"  सुनकर वह युवती बहुत डर गई और थर-थर काँपते हुए बोली -"महाराज ! मुझे क्षमा कीजिए, मुझे क्षमा कीजिए, मेरा कोई दोष नहीं है।  ब्रजवासियों ने आपकी परीक्षा के लिए मुझे आपके पास भेजा है,  इसलिए मैं आपके यहाँ  आई हूँ, मुझे क्षमा कीजिए। यह सुनकर उन्होंने कहा -"अच्छा, चली जा, और कभी साधु के पास इस तरह नहीं जाना।  सब साधु बराबर नहीं होते, कोई कोई योगिराज भी हैं।" 

अन्य एक दिन सायंकाल के पश्चात श्री रामदासजी अकेले उस घाट पर बैठे थे। ऐसे समय में रूप-सम्पन्ना पंजाबी युवतियों ने आकर उनको प्रणाम किया और कुछ भेंट आगे रखकर हाव-भाव और कटाक्ष के साथ वार्तालाप करना आरम्भ किया। कुछ समय यों ही बिताकर उनमे से एक उनकी इन्द्रिय पकड़कर खींचने लगी।  उन्होंने कहा -" ले साली**** पकड़ लिया तो ले !! इसमें क्या है ? मैं तो इसमें कुछ नहीं देखता , तेरी जीतनी मर्जी हो तू इसको अच्छी तरह से देख ले।"  उन दोनों ने उनकी इन्द्रियों को नाना प्रकार से उत्तेजित करने की चेष्टा  की, परन्तु किसी प्रकार भी वे सफल न हुई |" तब वे युवतियां लज्जित होकर वहाँ से चली गई।

इसके दूसरे दिन वृन्दावन के गौतम ब्राम्हण छन्नुसिंघजी (जो बड़ा भारी पहलवान थे और सर्वदा श्री रामदासजी से बातें किया करते थे )  आकर श्री रामदासजी से बातें करने लगे श्री रामदासजी भी बड़े बलवान पुरुष थे और ब्रजवासियों से सखा भाव रखते थे, जिससे उनके साथ बराबरी का मेलजोल रखते हुए समवयस्क मित्रों के समान हसी-ठट्ठा आदि करते थे।  उस दिन छन्नूसिंह ने वार्तालाप करते हुए कहा -"बाबाजी ! तुम्हारी पहलवानी और शक्ति जान ली गई।  तुम जब "नामर्द" हो तो तुम्हारी पहलवानी कैसी ? यह सुनकर श्री रामदासजी ने पिछले दिन की बात स्मरण कर इस वाक्य का अभिप्राय समझ लिया और कहा -"अरे तूने मुझे नामर्द कैसे जाना ? देख ले तेरे से मेरा इन्द्रिय कितना बड़ा है। तेरा कभी इतना बड़ा न होगा।"   इतना कहकर उसी समय वृहत इन्द्रिय निकलकर उसे लोहे के मेख की भांति कर दिखलाया, जिससे छन्नुसिंघ का भ्रम मिट गया और वे दण्डवत प्रणाम करके बोले-" बाबाजी ! तुम यथार्थ कामजित पुरुष हो , जब युवती भी तुम में काम संचार न कर सकी, तब हम लोगों ने समझा था कि तुम अवश्य  पुरुषत्वहीन होंगे पर आज मुझे तुम्हारे प्रभाव का परिचय मिला, तुम साक्षात् महेश्वर हो।" 

एक  दिन छन्नुसिंह  जी  श्री रामदासजी के पास बैठकर बातें कर रहे थे कि इतने में श्रीवृन्दावन का एक नामी चोर  आकर श्री रामदासजी को दण्डवत प्रणाम करके गांजा पिने के लिए उनके पास बैठा।  उसका नाम गोसायाँ था। श्रीवृन्दावन के  ब्राम्हण-कुल में उसका जन्म हुआ था, पर वह डाकुओं का सरदार था और नाना प्रकार के उदण्ड काम सदैव किया करता था।  उसे  कोई पकड़ नहीं पता था।  अंत में एक अंग्रेज अफसर ने गोरों की पलटन साथ लेकर एक जंगल को चारो और से घेरकर उसे पकड़ा था और उसको करदण्ड देकर १४ वर्ष  के लिए द्वीपान्तर में भेजा था। 14 वर्ष कारावास भोगकर वह श्री वृन्दावन लौट आया था; किन्तु 14 वर्ष का कठिन कारावास को भोगने पर भी उसका चरित्र तनिक भी नहीं सुधारा था।  उसके अत्याचार से  सब लोग भयभीत रहते थे। वह गांज पीने  के लिए श्रीरामदासजी के समीप जब आकर बैठा तब छन्नुसिंह ने उनसे कहा -" बाबजी महाराज! आप इस चोर को सुधार  दीजिए। ब्राम्हण-कुल में जन्म लेने पर भी इसके सामान उदण्ड  डाकू श्रीवृन्दावन भर में नहीं है। इसके अत्याचार से मुहल्ले  वाले सर्वदा भयभीत रहते है। १४ वर्ष के कठोर कारावास से भी इसमें कोई बदलाव नहीं आया। आप सिद्ध  महात्मा पुरुष है, आप इसको सुधारकर लोगों को भय से बचाइए। " यह सुनकर श्रीरामदासजी ने गोसायाँ से कहा -"क्यों गोसायाँ तू साधु बनेगा ? चौर्यवृत्ति को छोड़कर तू मेरा चेला होगा ? " इन वाक्यों ने गोसायाँ के ह्रदय विद्दुत-प्रवाह के समान प्रभाव डाला। कुछ समय चुप रहकर बहुत ही आर्तस्वर से गोसायाँ ने कहा -"महाराज! मैंने इतने कुकर्म किये है जो कोई मनुष्य नहीं कर सकता, इस पर भी क्या आप  मुझे अपना चेला बनाएँगे ?"  श्रीरामदासजी ने  मुस्कुराकर कहा  - "हाँ मैं   बनाऊँगा।"  उनकी बात सुनकर गोसायाँ तुरंत ही बाजार जा कर कण्ठी लाया, श्रीरामदासजी ने भी शंख बजाकर उसके गले में कण्ठी बांधकर उसको दीक्षा दी। तब से गोसायाँ का ह्रदय परिवर्तन हो गया। चोरी करने और लोगों पर अत्याचार करने की प्रवृत्ति दूर हो गई और वह एक अति प्रेमिक-प्रकृति का दयाद्रचित साधु बन गया। उसने यमुनाजी के तट  पर श्रीवृन्दावन के एक एकांत उपवन में अपना निवास-स्थान बनवाया और वहीँ रहकर भजन करने लगा।  केवल संध्या के पश्चात वह एक बार शहर जाकर किसी न किसी  दुकान के पास खड़ा हो जाता था कर दुकानदार स्वतः उसको भोजन के लिए दूध, पूड़ी इत्यादि प्रतिदिन दे देते थे। कभी- कभी साधुओं की जमात में जाने पर आमोद करने के लिए या उसकी पूर्वप्रवृत्तिवश ही वह एक का लोटा दूसरे के यहाँ और दूसरे का लोटा तीसरे के यहाँ छिपा के रख देता था । सब जानते थे की यह सब काम गोसायाँ का ही है और इसलिए "चोर गोसायाँ '' कहकर उसकी हँसी उड़ाते थे। गोसायाँ भी हँसी-मजाक में बात को टाल  देता और अपनी चौर्यवृत्ति और १४  वर्ष कारावास सम्बन्धी स्वरचित सुदीर्घ गीत गाकर सब लोगों को आनन्दित करता था। इस प्रकार से महापाषण्ड चोर भी श्रीरामदासजी की कृपा से प्रेमी साधु बन गया।


जीवनी आगे जारी रहेगी........ |   

हमें सहयोग करें जिससे इस ब्लॉग को और बेहरत बना कर आपकी सेवा की जा सके (Click here)


Comments

Popular posts from this blog

श्री 108 श्री स्वामी रामदासजी काठिया बाबा का जीवन चरित्र | Part 01

मौनी स्वामी की जीवनी

सारा दुःख मिट सकता है