श्री 108 श्री स्वामी रामदासजी काठिया बाबा का जीवन चरित्र | Part 04
श्रीरामदासजी की सभी आवश्यकीय वस्तुएँ बिना मांगे ला लाकर लोग पंहुचा देते थे। दो-तीन रूपए के गांजे और चरस की भेंट नित्य आ जाती थी। और इसी भांति खाने की सभी सामग्रियां भी आ जाती थी। इस वैभव को देखकर चोरों ने विचारा कि उन्होंने बहुत रूपए बटोर कर रख लिए होंगे, इसलिए रात्रि में आकर वे कभी कभी उत्पात मचाने लगे। रात्रि के चोर दिन में सज्जन बनकर फिरते थे। चोरों में कोई ब्राम्हण, कोई क्षत्रिय तथा कोई अन्य जाती के थे। उन में से कोई- कोई दिन में उनके पास आ बैठते और तमाखू, गाँजा पीते तथा गप - शप करते थे। एक दिन सवेरे ऐसे ही तीन भद्रवंशोद्भव वृन्दावनवासी चोरों ने उनके पास बैठकर बातें करते-करते किसी बात से उत्तेजित होकर उनसे कहा -"बाबाजी! सिंह की भाँति निर्भय होकर बातें करते हो, इसका फल एक दिन रात को भली- भांति पाओगे।" तब श्रीरामदासजी ने कहा -"मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि तुम लोग चोट्टे-बदमाश हो, पर अब तुम इतने बढ़ चढ़ रहे हो कि साधु को भी धमकाने लग गए हो। अच्छा मैं कह देता हूँ कि तुम आज ही पुलिस से पकड़ लिए जाओगे।" चोरों ने कहा -"अरे, रहने दे बाबाजी तेरी सिद्धाई , हमलोगोंको पकड़नेवाला कोई नहीं है।" यह कहकर वे अवज्ञापूर्वक वहां से चले गए। किन्तु इसके पश्चात थोड़ी ही देर में पुलिस ने किसी चोरी के अपराध में उन तीनों को पकड़कर उसी दिन ही अदालत के सामने उपस्थित किया। तीनो जमानत पर छूटे और मुकदमे की तारीख नियत हुई। उनमे से दो अदालत से छूटते ही श्रीरामदासजी के निकट आए और हाथ जोड़कर चरणों में गिरकर बोले -"महाराज ! हम आपके बच्चे हैं, हम पर आप कृपा कर हमारे अपराध को क्षमा कीजिए। हमें पुलिस पकड़कर अदालत ले गई थी , वहां से हम जमानत पर छूटकर आपके पास चले आ रहे है। अब यदि हमपर आपकी कृपा न होगी तो हमको दंड मिलेगा। हमारा अपराध क्षमा कीजिए, हम फिर कभी ऐसा अपराध नहीं करेंगे।" तब उन्होंने कहा -" तुम यह प्रतिज्ञा करो कि तुम फिर कभी साधुओं को उद्विग्न न करोगे और चोरी भी न करोगे।" वे बोले -"नहीं, कभी न करेंगे।" श्रीरामदासजी ने प्रसन्न होकर कहा -" अच्छा जाओ,तुम दोनों छूट जाओगे।" तब वे दोनों दण्डवत प्रणाम करके चले गए। मुकदमें की तारीख़ पर वे दोनों छूट गए, पर तीसरे को चार मास के कारावास का दंड मिला। उसने अपील की जो निष्फल हुई। उसको लोहे की बेड़ी पहनाकर सड़क के मरम्मत के लिए मिटटी खोदने के काम में लगाया गया।
एक दिन श्रीरामदासजी उसी सड़क से मथुरा से बृन्दावन को जा रहे थे। तभी उन्होंने उस चोर को मिटटी खोदते हुए देखा। उसने भी उनको देखकर सड़क पर ही दण्डवत प्रणाम किया और रोते हुए कहा -"महाराज ! इस बार तो मैं निर्दोष था ; तथापि आपके अभिशाप से ही मैं यह कष्ट भोग रहा हूँ। हम ब्रजवासी आपके अबोध बच्चे हैं। मुझे इतना कठिन दंड देना क्या आपको उचित था ? " उसके केश को देखकर और उसकी क़तारोक्ति से दयाद्र होकर उन्होंने कहा -" अच्छा , फिर कभी साधुओं को कष्ट न देना। आज से तीसरे दिन तू कारावास से मुक्त हो जाएगा।" वह बोला -" महाराज ! यह कैसे होगा ? मेरी अपील तक नहीं सुनी गई।" अरे! संतन के वचन पर अब भी तुम्हे विश्वास नहीं होता ? हमारा वचन कभी झूठा नहीं होगा।" यह सुन प्रसन्न होकर उसने फिर दण्डवत प्रणाम किया। वे वहां से चल दिए तत्पश्चात तीसरे दिन यह राजकीय आदेश हुआ कि प्रत्येक कारागार से तीन-तीन कैदी छोड़ दिए जाएं। इस आदेश के अनुसार वह ब्राम्हण भी मुक्त हो गया वह रामदासजी के पास बृन्दावन में आकर उनको साष्टांग दण्डवत प्रणाम करके उनकी महिमा का वर्णन करने लगा।
एक बार श्रीबृन्दावन के कुम्भमेले में श्रीरामदासजी को भारत के उपस्थित महन्तों ने मिलकर ब्रजमंडल के ब्रजविदेही महन्त और कुम्भ मेले के चारसम्प्रदाय के श्री (प्रधान ) महन्त पदों पर अभिषिक्त किया।
अधिकतर सभी साधु गांजा और चरस पीते है, बहुत ब्रजवासी भी गांजा और चरस पीते है। एक गौतम ब्रजवासी ने साधुओं के बल की परीक्षा लेने के लिए एक बड़ा भारी चिलम बनवाकर उसमे एकदम सवा सेर चरस चढ़ाया। चरस चढाने की रीती यह है कि पहले चिलम में तम्बाकू चढ़ाकर उस तम्बाकू के बिच में चरस की गोली रखनी होती है, जिसपर फिर तम्बाकू चढ़ाकर उस तम्बाकू के ऊपर कोयले के जलते हुए अंगारे रखे जाते हैं, तब चिलम को हाथों से पकड़कर मुँह से खींचकर धुआँ पीना होता है। जोर से खींचने से ऊपर वाली तम्बाकू की तह से जलने पर चरस तक आग की आँच पहुँचती है और चरस धक्-धक् कर जलने लगती है। उस समय चिलम के ऊपर अग्निशिखा दिखाई देती है। इसी को चरस उड़ाना कहते है। सवा सेर चरस का गोला एक साथ एक चिलम में चढ़ाना हो तो कम से कम सवा सेर तम्बाकू (तम्बाकू के पत्ते के बूरे से गुड़ मिलाकर ) चाहिए। इस रीती से सवासेर चरस एक बड़े भारी चिलम में चढ़ाकर उसे लोहे की सांकल से बांधकर उस ब्रजवासी ने एक वृक्ष की डाल में लटका दिया और सबको पुकार कर कहा -" जिसमें सामर्थ्य हो वह आकर चिलम को चढ़ावे।" बहुत लोगों ने चेष्टा की, किन्तु उनमे से कोई भी उसमे से धुआँ तक न निकाल सका। अंत में बहुत साधु इकट्ठे होकर श्रीरामदासजी के यहाँ जाकर उनसे बोले -"महाराज ! एक ब्रजवासी एक चिलम में सवा सेर चरस भरकर कह रहा है कि किसी साधु की सामर्थ्य हो तो इसको उड़ावे। हम सभी ने चेष्टा की, लेकिन कोई साधु इसका धुआँ तक न निकाल सका। आप ही यदि चलकर साधुओं का नाम रक्खें तो मान रहे ।" उन्होंने कहा -"मैं चलता हूँ ।" वे गरीबदासजी को संग लेकर जहाँ चिलम लटकी थी, वहां गए और बोले -" अच्छा गरीबदास ! तुम पहले इसका धुआँ निकालो ।" तब गरीबदासजी ने खूब जोर से दम लगाया, उससे कुछ धुआँ निकला पर चिलम न उड़ी। यह देख श्रीरामदासजी ने स्वयं जाकर ऐसा कसकर दम लगाया कि समस्त चरस एकदम धक्-धक् करके जल उठी और उसकी शिखा वृक्ष के ऊपर तक जा पहुँची। तब सब लोग जयध्वनि कर उठे और उस ब्रजवासी ने भी प्रसन्न हो भेंट चढ़ाकर उनकी पूजा की।
श्रीरामदासजी की धूम्रपान की शक्ति के विषय में और एक घटना प्रचलित है। एक बार वे श्री गरीबदासजी को संग लेकर भरतपुर से लगभग दो सेर चरस साथ रख श्रीबृन्दावन की ओर आ रहे थे। अंगरेजी राज्य में इतना चरस साथ में रखना नियम-विरुद्ध था। पुलिस उनको मजिस्ट्रेट साहब के समीप ले गई। बाबा ने कहा -" मैं इतना तो एक दिन में पी जाता हूँ ।" साहब ने कहा -"इतना चरस एक रोज में पी जाते हो ? अच्छा, हमको दिखलाओ।" उन्होंने गरीबदासजी को आधा - आधा पाव चरस चिलम में चढाने की आज्ञा दी और मजिस्ट्रेट के सामने इस भाँति चिलम में दम लगाने लगे कि धक्-धक् करके चिलम के ऊपर अग्निशिखा उठने लगी, उसे देखकर मजिस्ट्रेट की पत्नी डरकर चिल्लाने लगी और उसने साहब से कहा -"अच्छा इसको छोड़ दो , मजिस्ट्रेट ने कहा -'' तुमको चरस का ताम्रपत्र दे देंगे, और कोई तुमको नहीं पकड़ेगा।" उन्होंने कहा -"मुझे ताम्रपत्र नहीं चाहिए, कोई पकड़ेगा तो फिर ऐसे ही पीकर दिखा दूंगा।" तब साहब और मेम ने कहा -" अच्छा, आप जाइये।"
एक बार उज्जैन के कुम्भ मेले में कई दिन पहले ही अनेक सन्यासी (शिव भक्त )पहुँचे गए। उनमे एक श्रेष्ठ तपस्वी थे। उनमे अनेक प्रकार की अलौकिक शक्तियां थीं। उज्जैन के राजा उनकी विभूतियों को देखकर उनके शिष्य हो गए। इससे सन्यासियों ने उत्साह और हर्ष से फूलकर कुंभमेले के समस्त स्थानों पर अपना अधिकार जमा लिया और प्रतिज्ञा की कि वैष्णव साधु-दलों को मेले में स्थान न देंगे। साधूलोग यथासमय मेले में उपस्थित हुए, पर सन्यासियों ने उनको उनके निर्दिष्ट स्थान में प्रवेश नहीं करने दिया, वे सब मेले के बाहर इकठ्ठा होने लगे। लगभग साठ हजार साधु मेले के बाहर एकत्र हुए। किन्तु शैव सन्यासियों की संख्या इससे भी अधिक थी और राजा को आनुकूल्य पाकर उन लोगों का गर्व और भी बढ़ गया था। इसलिए वैष्णव साधुओं का इतना साहस न हुआ कि उनसे लड़कर अपने निर्दिष्ट स्थान पर अधिकार जमाते। अतः सभी साधु वहाँ से एक साथ लौटने लगे। ब्रजविदेहि महन्त तथा वैष्णव चारसम्प्रदाय के श्रीमहन्त होने से श्रीरामदासजी को प्रत्येक कुम्भमेले में जाना पड़ता था। इसलिए वे कुछ साधुओं को संग लेकर उज्जैन की ओर जा रहे थे। लौटते हुए उन साधुओं के बड़े भारी दल से उनकी भेंट हुई। उन्होंने अपर महन्तों से पूछा -"तुम लोग क्यों लौटे आ रहे हो ? अभी तो मेले की तिथि ही नहीं आयी है ?" महन्तों ने कहा -"हम लोगों की संख्या साठ हजार है, किन्तु शैव सन्यासियों की संख्या हमसे भी अधिक है। और राजा को चेला बनाकर वे शक्तिसम्पन्न हो गए है और उन्होंने हमारे निर्दिष्ट स्थानों पर अधिकार कर लिया है। यदि हमलोग वहाँ प्रवेश करना चाहते हैं तो वे दंगा करने को प्रस्तुत होते हैं। इसलिए हम वहॉं से लौटे आ रहे हैं।" यह सुनकर उन्होंने कहा -"तुम व्यर्थ साधु हुए हो। यदि मृत्यु से डरते हो तो तुम्हें घर में ही रहना चाहिए था। साधु होकर मृत्यु से डरना ठीक नहीं है। यदि तुमलोगों के अपने निर्दिष्ट स्थान में जाने की चेष्टा से लड़ाई होती है तो उसमे हानि ही क्या थी ? सन्यासी (शिवभक्त ) लोग शिवजी की उपासना करते हैं, उन्होंने शिवजी की श्रेष्ठता प्रदर्शित करते हुए तुमलोगों के स्थान पर अधिकार कर लिया है, तुम लोग विष्णु की महिमा का कीर्तन करते हुए अपने स्थान पर अधिकार पाने के हेतु यदि लड़ाई करते तो तुम सब "विष्णु-विष्णु कह प्राण त्यागकर वैकुण्ठ धाम को पधारते और सन्यासी लोग शिव-शिव उच्चारण करते हुए प्राण त्यागकर शिवलोक को प्राप्त होते। इसमें दोनों का कल्याण होता, तुम्हारा कायर पुरुषों के सामान लौट आना अनुचित हुआ है इससे तुमने अपने उपास्यदेव विष्णु पर कलंक लगाया है।" उनके इस प्रकार के वाक्य से सब साधु उत्साहित हो उनसे बोले -"हमने न्याय विरुद्ध आचरण किया है, आप हमारे आगे-आगे चलिए, हम साठ हजार आपकी सेना बनकर आपके पीछे-पीछे चलते हैं |" यह कहकर उन्होंने एक महन्त के हाथी को लाकर उनके सामने उपस्थित किया | उसपर चढ़कर वे सबके आगे-आगे चले और समस्त साधु दल उनके पीछे चला | कुम्भमेला मैदान में उपस्थित होने पर सबके आगे श्रीरामदासजी का स्वरुप दर्शन करते ही सन्यासीदल विमुग्ध हुए और भयभीत होकर साधुओं (विष्णुभक्त ) के निर्दिष्ट स्थान को छोड़ अपने ही निर्दिष्ट स्थान पर जाकर उन्होंने अपने-अपने आसन लगाए | कुम्भ का मेला भी निर्विघ्न समाप्त हुआ |
एक बार श्रीरामदासजी साधुओं की एक बड़ी जमात को लेकर विभिन्न स्थानों पर भ्रमण कर रहे थे | गावों के बाहर जहाँ वृक्ष की छाया होती और पिने को स्वच्छ जल होता उस स्थान पर जमात के साधु अपना आसन लगाकर बैठ जाते | भारत के पश्चिम देश में यह नियम था कि जमात के पहुंचने पर गाँव के लोग दर्शन के लिए आकर दण्डवत प्रणाम करते हैं और साधुओं की कितनी मूर्तियां है जानकार उसी संख्या के अनुसार आटा, दाल , नमक अदि सामग्री एकत्र कर महन्तजी के पास पहुँचा देते हैं | तत्पश्चात महन्तजी की आज्ञा से दो-चार साधु सामग्रियों को प्रत्येक साधु के आसन के समीप जाकर बाँट देते हैं | इससे कभी कभी होता था कि जिनके साथ पांच साधु होते वे दस कहकर दस का सामान माँग बैठते , इसलिए कभी-कभी झगड़ा भी हो जाता | श्रीरामदासजी के साधु जमात में भी किसी-किसी दिन इस प्रकार का झगड़ा उपस्थित हो जाता था | उस जमात में एक परमहंस थे | ऐसे झगड़े से कुढ़कर एक दिन श्रीरामदासजी से बोले -"तुम्हारे सम्प्रदाय का वैराग्य कुछ नहीं है | पेट के लिए लड़ते हैं |" समस्त वैराग्य सम्प्रदाय के प्रति इस प्रकार की तीव्र अवज्ञा सुनकर तत्काल ही हाथ जोड़कर परमहंस जी से कहा -"महाराज ! वैराग्य कैसा होता होता है, आप कृपा करके मुझे उपदेश दीजिए , आज से आपके उपदेश के अनुसार चलूँगा |" परमहंसजी प्रसन्न हुए और अपने को गुरु स्थान में स्थापित समझकर बोले -"बच्चा, वैराग्य ऐसा होता है कि किसी ने कोई चीज़ तुम्हारे आगे लाकर धर दी तो अपने प्रयोजन के अनुसार उसमें से कुछ ले लो , ऐसे जो कुछ मिले उससे संतोष कर लिया , किसी से मांगना नहीं, अपने मन से सदा संतोष रखना !" यह सुनकर उन्होंने कहा-" महाराज! आजसे मेरा आसन आपके आसन के समीप लगेगा जैसा बताया मैं वैसा ही करूँगा, और साधु ऐसा करें या ना करें |" तदनन्तर उन्होंने साधुओं के मुखिया को एकान्त में बुलाकर कह दिया -" आज से तुम्हारे वास्ते रिद्धि-सिद्धि नहीं आएगी , तुमलोग गांव में जाकर कुछ दिन तक मांगकर गुपचुप अपना गुजरा कर लेना , जमात के पास और रिद्धि-सिद्धि नहीं आएगी | परमहंस को कुछ दिखलाना चाहिए |" दूसरे दिन प्रातःकाल उस स्थान से जमात उठी और मध्यान्ह के समय दूसरे गांव में पहुंची | किन्तु उस दिन उन साधुओं के लिए सामान नहीं आया | और साधु गांव के घरों में भिक्षा मांगकर गुपचुप खा पी आए | केवल श्रीरामदासजी गांजा,चरस,भांग पीते थे | परमहंसजी वह भी नहीं पीते थे, केवल जल पीकर रह जाते |
दूसरे दिन जमात उठकर एक और गांव में जा पहुँची | वहाँ के लोगों ने भी सामान नहीं पहुँचाया | वे दोनों फिर से उपवास ही रह गए और सब साधु पूर्ववत गांव में जाकर गुपचुप भोजन कर आये | इस भाँति दिन पर दिन बिताने लगे, परमहँस जी क्रमशः दुर्बल होने लगे | आठवें दिन परमहंसजी में चलने की भी शक्ति न बची, वे विकल हो आर्तभाव से बोले-" बाबा ! भोजन के अभाव से मेरे भीतर चलने की शक्ति न रही, अब मेरे प्राण निकलते है |" यह सुनकर श्रीरामदासजी ने कहा -"परमहंसजी ! आप आर्तनाद रहे हैं,आपके लिए क्या करना होगा, मुझको आज्ञा दीजिए |" उन्होंने कहा -" बाबा ! क्षुधा से मेरे प्राण निकल रहे हैं, मेरी और वाक्यस्फर्ति नहीं, तुम गांव से कुछ खाद्य सामग्री मांग के लाकर मुझको दो, नहीं तो प्राण निकल जाएंगे |" तब श्रीरामदासजी ने हाथ जोड़कर कहा -" महाराज ! वैराग्य किसको कहते है ? आपने तो बताया था कि किसी से मांगने से वैराग्य नहीं रहता है, अब मुझे कैसे मांगने का उपदेश देते हो ?" यह सुनकर परमहंसजी सचेत हुए और यह समझ के कि उन्होंने वैराग्य की अवज्ञा कर बड़ा ही अपराध किया है , वे हाथ जोड़कर बोले -" बाबा ! मुझसे बड़ा कसूर हुआ है, तुम क्षमा करो, मैं अज्ञानी हूँ | वैराग्य का माहात्म्य मुझे मालुम नहीं था, मेरे अपराध को तुम क्षमा करो, मैं कान पकड़ता हूँ |" तब श्री रामदासजी ने प्रसन्न होकर कहा -" परमहंसजी ! आप कुछ चिंता मत कीजिए, अभी गांव वाले सब रिद्धि-सिद्धि लेकर आपके सामने उपस्थित होंगे, वैराग्य की ऐसी निंदा नहीं करना, वैष्णव लोग बड़े लीला-चतुर होते हैं, इनके प्रभाव को समझना बड़ा कठिन है , ये सब लीला करते फिरते हैं, किस घाट में कैसे पुरुष विराजते हैं इसका पता सबको नहीं मिलता है |" उनके ऐसा कहते ही कहते यह देखने में आया कि गांव के लोग सर पर खाने का सामान लेकर आ रहे है और थोड़ी ही देर में उन्होंने सब सामान श्रीरामदासजी के समीप उपस्थित किया | परमहंसजी भी समुचित शिक्षा पाकर विनम्र हुए |
प्रतिवर्ष जन्माष्टमी के दो दिन पश्चात दशमी से चौरासी कोस बाली से ब्रजपरिक्रमा प्रारम्भ होती है | इस परिक्रमा का परिचालन ब्रजविदेही महंत होने से श्रीरामदासजी ही करते थे भारत के विभिन्न देशों से बहुत साधु इकट्ठे होकर उनके साथ परिक्रमा में जाते थे | मथुरा में जहाँ भूतेश्वर महादेव विराजते हैं वहीँ से परिक्रमा आरम्भ होती है और लगभग महीने में समाप्त होती है | जिस दिन परिक्रमा पूरी हो जाती थी, उस दिन जमात मथुराजी से लौटकर जहाँ गोकर्ण महादेवजी हैं उसी स्थान पर कई दिनों तक टिकती थी | ततपश्चात जमात टूटती और सभी साधु अपने-अपने स्थान को लौट जाते | जमात जितने दिन गोकर्ण महादेव जी के यहाँ रहती थी उतने दिन मथुरा के निवासी साधुओं के भोजन का सामान उपस्थित कर देते थे | एक बार श्रीरामदासजी ने परिक्रमा के अंत में जमात लेकर उसी प्रकार गोकर्ण महादेवजी के समीप अपना आसन लगाया और जमात के साधु वहीँ आ गए | उस बार उन साधुओं में से कोई-कोई साधु बड़े क्रोधी थे | शहर में उन्होंने गृहस्थों के घर जा कर दूध लुटाने में बड़े झगड़े किये और इस कारण से शहरवालों ने रुष्ट होकर पहले दिन साधुओं के लिए खाद्य-सामग्री न पहुँचाई | इससे सब साधु बिना खाए रह गए | साधुओं के लिए श्रीचतुर चिंतामणि नागाजी महाराज के प्रति भगवान के ब्रज में दूध लूटने के वरदान से साधु लोग दूध लूटने के अधिकारी हैं | यह वे लोग जानते है | उस बार पहले दिन साधुओं को भूखा रहना पड़ा | उसके दूसरे दिन कई मथुरा-वासी दर्शन के लिए आए | उनमे से कुछ बाबू लोग जूता पहने हुए श्रीरामदासजी के समीप बैठकर वार्तालाप करने लगे | वे लोग जूता पहने हुए धुनि के समीप बैठे हुए है ये उन्होंने लक्ष्य नहीं किया था | पर एक साधु ने आकर यह देखकर कहा -"अरे ! तुम सब कैसे जूता पहनकर साधु के धूनी में बैठ गए ?" यह सुनकर उनमें से एक कह उठा -"अरे ! हम भी ब्रजवासी साधु ही हैं, जूता ले आए तो क्या हुआ ?" इस से रूठकर उस साधु ने दो एक गालियाँ दे दी | उस मथुरावासी ने भी गालियाँ देकर कहा -" अरे सब पेट का वैराग है ? हम सब जानते है, सभी बड़े-बड़े जाते हैं और यहाँ आकर भूखा मरता है |" इस अवज्ञासूचक वाक्य को सुनकर श्रीरामदासजी ने केवल एक ही बार उसकी ओर तीव्र दृष्टि से देखा, किन्तु एक बात भी उन्होंने नहीं कहा | उस दृष्टि से ही वह जहाँ खड़ा था वहीँ तत्काल ही भूमि पर गिर गया और छटपटाने लगा | दूसरे मथुरावासी, जो जमात के दर्शन के लिए आए थे उसकी सुश्रुषा करने लगे | परन्तु देखते ही देखते वह मृत्यु को प्राप्त हो गया | तब सब हाय-हाय करते हुए उसके शव को वहां से हटा ले गए | तत्पश्चात नगर के लोग ने आकर साधुओं से क्षमा मांगी और उनकी सेवा करने लगे | किन्तु उस बार गोकर्ण के महन्तजी से भी कुछ गोलमाल होने से श्रीरामदासजी ने कहा -" मैं और कभी यहाँ आकर आसन नहीं लगाऊंगा |" तब से परिक्रमा के पश्चात वे फिर कभी वहां नहीं जाते थे | कई वर्ष बाद कोई-कोई साधु उसके निकटवर्ती स्थानों में आसन लगते थे परन्तु उस समय से उस स्थान पर साधुओं का मेला नहीं लगता है |
कुम्भ का मेला हरिद्वार इत्यादि स्थानों में निर्दिष्ट समयों पर हुआ करता है | वैष्णव चारसम्प्रदाय के श्रीमहन्त श्रीरामदासजी को सब कुम्भमेले में जाना पड़ता था | इसके अतिरिक्त ब्रजविदेहि महन्त होने से ब्रजचौरासी कोस की परिक्रमा में भी वे प्रतिवर्ष जाते थे | और उस समय वे प्रायः श्रीबृन्दावन में जमुना तट के पूर्वोक्त घाटपर ही रहते थे | बहुत ब्रजवासी जिनमें से अधिकतर गौतमवंशीय ब्राम्हण विशेष रूप से उनपर आकृष्ट हुए थे | उन गौतमवंशीय ब्राम्हणों में प्रधान छन्नुसिंह,नोनसिंह आदि का एक बगीचा केमारवन मुहल्ले में रेलवे लाइन से संलग्न था | यहाँ हनुमानजी की मूर्ति स्तापित थी | उस स्थान पर ब्रजवासी युवक और बालक कुश्ती लड़ने जाते थे छन्नुसिंह आदि बगीचे के मालिकों ने उनको उस बगीचे में जाकर स्थापन करने को मनस्थ कर उनके समीप एक दिन इस विषय का प्रस्ताव किया | उन्होंने कहा -" यदि तुमलोग मुझे उस स्थान का दान करो तो यहाँ मैं जा सकता हूँ, नहीं तो इस यमुना के किनारे ही मैं आनंद से हूँ |" उनलोगों ने दान करने को सम्मत होकर कहा कि आप तथा आपके चेले, परचेले आदि में से जब तक कोई जीवित रहेगा, तब तक उस भूमि पर आप लोगों स्वत्व रहेगा, किन्तु जब चेला श्रेणी का कोई न रहेगा, तब बगीचों में फिर हमारे वंशजों का स्वत्व होगा | यह कहकर उन्होंने उनको बगीचा अर्पण कर दिया | इसके बाद वे तीर से उठकर उस बगीचे में आए | वहां उन्होंने झोपड़ी बनाकर उसके भीतर धूनी स्थापन की और तब से वे उसी स्थान पर रहने लगे |
श्री तराकिशोर जी , जो श्रीरामदासजी के कई चेलों में से एक थे, उन्होंने बाबाजी की महिमा का वर्णन करते हुए लिखा है कि बरसाने से कुछ दूर कदमखंडी नामक स्थान में श्रीनागाजी भगवद्दर्शन कर सफल-मनोरथ हुए थे, जो अब "नागाजी की कदमखंडी " के नाम से प्रसिद्द है | श्रीनागाजी महाराज के मानव-लीला असंवरण करने पर यहीं उनके शरीर की समाधी हुई थी| जन्माष्टमी के पश्चात शुक्लचतुर्दशी को ब्रजपरिक्रमा कर साधु मंडली वहां पहुँचकर आसन लगाती है और ब्रजमंडल के ब्रजवासी भी उसदिन वहां इकट्ठे होते हैं । उसदिन वहाँ बड़ा भारी मेला लगता है, तथा रासधारी लोग (रासमण्डली ) आकर रासलीला करते हैं | ब्रजवासी उसदिन वहाँ मालपुए का भोग लगाते हैं और साधु लोग मालपुए का प्रसाद पाते हैं | वह दिन नृत्य-गीत तथा आनन्द में कट जाता है | दूसरे दिन वहाँ से साधु-मण्डली के आसन उठते हैं और तीन कोस दूरवर्ती काम्यकवन के गयाकुण्ड नामक स्थान पर जाकर वे सब टिकते हैं | कदमखंडी और काम्यकवन के बिच में नीची भूमि है, जहाँ प्रायः प्रतिवर्ष कुछ-कुछ जल और कर्दम (कीचड़ ) मिलता है | एक वर्ष परिक्रमा के समय वहां इतना जल भर गया था कि अपनी बैलगाड़ी लेकर उसे पार करना असाध्य जान पड़ा | इसलिए श्री बाबाजी महाराज (श्रीरामदासजी ) ने कहा कि हम उस मार्ग से नहीं जाएंगे और गयाकुण्ड,मेहरान के मार्ग से न जाकर वे विठोरा,खटावत से होते हुए जमात से जा मिलेंगे | यह निश्चय हुआ कि श्रीबाबाजी महाराज के साधक चेले महन्त श्रीतिलकदासजी महाराज के साथ साधुओं की जमात गयाकुण्ड जाएगी | श्रीबाबाजी महाराज के लिए उस समय रसोई श्रीपुष्करदासजी बनाते थे | पर उन्होंने कहा कि वे तिलकदासजी के साथ गयाकुण्ड होते हुए जाएंगे | मैंने विचारा कि पुष्करदासजी के चले जाने से श्री बाबाजी महाराज को रसोई का क्लेश सहना पड़ेगा | इसलिए मेला भंग होने पर जब संध्या की आरती हो गई, तब पुष्करदासजी को साधुओं के जमात से कुछ दूर एक पहाड़ के बिच निभृत स्थान पर ले जाकर उनको मैं और अभयनारायणजी समझाने लगे कि श्री बाबाजी महाराज सरीखे महापुरुष की सेवा छोड़कर आपको और कहीं नहीं जाना चाहिए | पुष्करदासजी ने कहा कि वे लगभग बिस वर्ष से श्री बाबाजी महाराज के साथ रहते हैं, उनकी सिद्धता उन्होंने यहीं तक देखी है और जानते हैं कि वे कामजित पुरुष हैं | श्रीबाबाजी महाराज ने कामरिपु को सम्यक जीत लिया है, किन्तु उनका क्रोध और धन का लोभ नहीं गया है ये दोनों ही उनमे बहुत हैं | मैंने कहा -" अच्छा, आप कहते हैं कि उनमे क्रोध बहुत है और वे सदैव झगड़ते हैं पर आपसे पूछता हुँ कि क्रोधी मनुष्य का लक्षण क्या होता है ? आप ही कहिए न यदि किसी पर आपका क्रोध हो और किसी से आप झगड़ें तो झगड़े के पश्चात उसपर आपकी धारणा कैसी रहती है? उसपर द्वेष भाव क्या कम से कम कुछ समय के लिए नहीं बना रहता है ? झगड़ने के अनन्तर ही क्या उससे आप पूर्ववत निष्कपट भाव से मिल-जुलकर हास्य-कौतुक कर सकते है ? पुष्करदासजी ने कहा "नहीं ! कम से कम थोड़ी देर तक उसपर मनोमालिन्य रहता है |" फिर मैंने पूछा -" आप बीस वर्ष से बाबाजी महाराज के सात रहते है, आप सच बताइये क्या आपने देखा है कि किसी से झगड़ा करने के पश्चात उसपर उनका मनोमालिन्य बना रहता है ? " वे कुछदेर विचारकर बोले -" भाई मैं उनके विषय में कभी झूठ न कहूंगा, मैंने ऐसा कभी नहीं देखा : भले एक क्षण उन्होंने माँ की ...... , तेरी ......, इत्यादि अश्लील वाक्यों का प्रयोग किसी पर किया, यहाँ तक कि लाठी लेकर वे मारने भी गए, उसने भी उन्हें गालियां दी, पर दूसरे ही क्षण बालक की भांति उसके संग बैठकर हास्य-कौतुक आदि करने लग गए और भांति-भांति के गल्प के द्वारा आमोद-प्रमोद में प्रवृत हो गए | उनमें किसी प्रकार की भी विकार-बुद्धि नहीं रहती है |" मैंने कहा -" फिर तो आप उनके गाली बकने और झगड़ने को क्रोध नहीं मान सकते, आपको यही मानना पड़ेगा कि वह केवल उनकी बाहरी दिखावा है, वह उनकी लीला-मात्र है | जिन साधुओं का भगवत्साक्षात्कार हो जाता है उनके विषय में शास्त्र का कहना है कि उनमें से कोई बालकवत,कोई उन्मत्तवत, कोई पिशाचवत रहकर बाह्य व्यवहार किया करते हैं, जिससे अज्ञानी साधरणलोग उनका यथार्थ परिचय नहीं पा सकते और उनके सम्बन्ध से वंचित रहते हैं |"
जीवनी आगे जारी रहेगी........ |
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