पंडित श्यामसुन्दर

नन्दग्राम के श्रीराधारमणजी के पुत्र पण्डित श्यामसुन्दरजीका जन्म सन् 1895  के लगभग नन्दग्राम में हुआ। स्वामी अमृतानन्द सरस्वतीजी से विद्याध्ययन कर वे स्वयं ब्रजके पण्डितो के मुकुटमणि स्वरूप नन्दग्राम मे बहुत दिन विराजमान रहे। श्रीमद्भागवतके भी वे बड़े मर्मज्ञ थे। स्वामी करपात्रीजी, श्रीउड़िया बाबा, श्रीहरि बाबा, श्रीकृष्णबोधआश्रमजी और श्री अच्युतमुनि आदि जैसे विशिष्ट महात्मा भी श्रीम‌द्भागवत श्रवण करने उनके पास आया करते थे ।

वे माध्व-गौड़ीय सम्प्रदाय के श्रीश्यामानन्द की परम्परामें श्रीगोकुलचंद्र गोस्वामीसे दीक्षित थे। इतने बड़े विद्वान होते हुए भी वे बहुत ही सरल और भोले-भाले गरीब ब्रजवासी ब्राह्मण थे ।

अपने भोलेपन में ही वे अपने प्रारम्भिक जीवनमें एक सन्यासी  के प्रभावमें आ गये थे। उसकी बतायी उपासना के द्वारा उन्होंने ऐसी सिद्धि प्राप्त कर ली थी कि वे बिना प्रश्न किये उत्तर दे सकते थे, दूर देशकी और भविष्यकी बातें बता सकते थे।

एक दिन उनके गुरुभाई श्रीहीरानन्दजी ने उन्हें सावधान करते हुए कहा- 'यह सिद्धि तुम्हारी उपासनामें बाधक होगी।' उसी समय ललिता- कुण्डके एक महात्माने उन्हें श्रीमद्भागवतकी आराधना करनेकी प्रेरणा दी। उन्होंने सिद्धि को तिलाञ्जलि दे श्रीमद्भागवतकी आराधना करनेका निश्चय किया। वे नित्य भागवत पाठ करने लगे ।

तब एक दिन स्वप्नमें एक देवी ने उनके सम्मुख प्रकट होकर कहा- 'मैं कर्णपिशाचिनी हूँ। तुम भागवत छोड़ दो, तो मैं तुम्हें मालामाल कर दूंगी।'

उन्होंने झट उत्तर दिया- 'मैं तुम्हें छोड़ सकता हूं, पर भागवत नहीं छोड़ सकता।'

उसी दिनसे उन्होंने सिद्धि विसर्जन कर दी । यदि वे ऐसा न करते तो सचमुच मालामाल हो जाते। देश-विदेशमें उनका नाम हो जाता और बड़े-बड़े सेठ साहूकार और राजा-महाराजा उनकी टहल करते। पर उन्होंने तो श्रीमद्भागवतकी आराधना करनेका निश्चय कर लिया था। शास्त्र कहते हैं कि जिस क्षण कोई सुकृती पुरुष भागवत का अनुशीलन करनेकी इच्छा भर करता है, उसी क्षण भगवान् उसके हृदय में आकर बन्दी हो जाते हैं-


श्रीमद्भागवते महामुनिकृते कि वा पररीश्वरः । सयो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात् ।। (भा० १-१-२)


इसलिए उनके हृदयमें भगवान् बन्दी हो चुके थे। जिसके हृदयमें भगवान् विराजते हों, उसके हृदयमें सांसारिक सुख-भोग और मान-सम्मान- की कामनाके लिए स्थान कहाँ ?

उन्होंने प्राप्तकी हुई सिद्धिको तृणवत् त्यागकर सारा जीवन निर्धन और संसारकी आँखों से  ओझल रहकर नन्दग्रामके नीरव वातावरणमें निर्विघ्न  भजनशील जीवन व्यतीत करना ही उपादेय समझा। वे नित्य ब्रह्ममुहूर्तमें उठकर नाम-जप करते, स्नानादिके पश्चात् आह्निक और श्रीमद्भागवतका पाठ करते । मध्याह्न में भोजनकर बैठकमें चले जाते और नाम जप करते रहते । दोपहर में विद्यार्थियोको भागवत पढ़ाते । रात्रिमें फिर नाम-जप करते-करते सो जाते ।

उन्होंने सारा जीवन भागवत, भगवान् और भगवन्नामको छोड़ और किसी वस्तुसे न तो लगाव रखा, न उसकी चाहना की।

सन् 1968 में कार्तिक मासमें वे कुछ अस्वस्थ हुए। दीवालीके दिन ऐसा लगा कि अब उनका शरीर नहीं रहेगा। पर उन्होंने घरवालोंसे कहा- चिन्ता मत करो। मैं आज नहीं जाऊँगा। तुम लोग दीवाली और अन्नकूट यथावत् मनाओ । पंचमीको उन्होंने पूछा- 'गोपाष्टमी कब है ?'

उन्हें बताया गया गोपाष्टमी किस दिन है। तब वे बोले- 'मैं दूसरे दिन नवमीको चला जाऊँगा ।' जैसे अपने जानेका दिन उन्हें अपनी इच्छानुसार ही स्थिर करना रहा हो। थोड़ी देर बाद उन्होंने कहा- 'मेरी अस्थी व्रजके बाहर मत विसर्जन करना ।'

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